Wednesday, 2 October 2013

                                      भारत में प्रदूषण ........ 




 प्रदूषण एक ऐसा शब्द है जिसके नाम मात्र से ही  मन में विभिन्न प्रकार के रोग  आने लगते है।  बढ़ते  प्रदूषण से न केवल इंसानों  का बल्कि तमाम जीव जन्तुओ का जीवन खतरे में पड़ता है।  आज देश में बढ़ रहे प्रदूषण से लोगो  में विभिन्न प्रकार के जानलेवा रोग जन्म ले रहे है।  वैसे तो वातावरण में कई प्रकार के प्रदूषण है पर उनमे से कुछ  ऐसे है जिनका हमारे स्वास्थ्य पर बहुत नुकसानदेह प्रभाव होता है। जिसके बारे में निचे जानकारी दी गयी है।
 
वायु प्रदूषण

शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से भारत की वायु गुणता में अत्यधिक कमी आयी है। विश्वभर में 30 लाख मौतें, घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की राजधानी दिल्ली, विश्व के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में, प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से, दिल्ली में 12 प्रतिषत अधिक मृत्यु होती है।

एक अलग अध्ययन के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले दो दषकों में 2.5 प्रतिषत बढ़ा है, वाहनों से होने वाला प्रदूषण 8 प्रतिषत बढ़ा है जबकि उद्योगों से बढ़ने वाला प्रदूषण चौगुना हो गया है। भारत के प्रदूषणों में वायु प्रदूषण सबसे अधिक गम्भीर समस्या है। यह कई रूपों में हो रहा है जैसे- वाहनों से निकलने वाला धुऑं, उद्योगों से अषोधित औद्योगिक धुऑं, औद्योगिकीकरण के अतिरिक्त बढ़ते शहरीकरण से नये-नये औद्योगिक केन्द्र खुल गये हैं पर उनके लिए आवश्यक नागरिक सुविधाओं तथा प्रदूषण नियंत्रण के तरीकों का विस्तार नहीं हुआ है।

वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक प्रावधानों को दिल्ली जैसे शहर में पूर्णरूपेण लागू कर पाना काफी मुश्किल कार्य है। फिर भी इस दिशा में कार्य जारी है। विशेष रूप से सी.एन.जी. गैस के प्रयोग ने, इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है पर भविष्य में वाहनों की संख्या के लगातार बढ़ने की सम्भावना से, जुड़े हुए सरकारी प्रयासों की तथा प्रदूषण नियंत्रण प्रावधानों को कठोरता से लागू करने की आवश्यकता है।

पानी का प्रदूषण तथा बर्बादी

पानी के प्रदूषण के कई स्रोत हैं। सबसे अधिक प्रदूषण शहरों की नालियों तथा उद्योगों के कचरे का, नदियों में प्रवाह से फैलता है। वर्तमान में इसमें से केवल 16 प्रतिषत को ही शोधित किया जाता है और यही नदियों का जल अन्तत: हमारे घरों में पीने के लिए भेज दिया जाता है। जो कि अत्यधिक दूषित तथा बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं से भरा होता है। कृषि मैदानों से निकलने वाले कूड़े-कचरे को भी, नदियों में डाल दिया जाता है इसमें खतरनाक रसायन तथा कीटनाषक, पानी में पहुँच जाते हैं।

पिछले पचास वर्षों में उद्योगों का निरन्तर विस्तार हुआ है। कुछ उद्योगों में जल प्रदूषण, जैविक प्रदूषक तथा जहरीले कचरे के रूप में अधिक सघन है। खाद्य उत्पाद तथा औद्योगिक रसायन बनाने वाले, उद्योगों में यह ज्यादा पाया जाता है। वास्तविकता यह है कि ''गंगा क्रिया योजना'' के अन्तर्गत पड़ने वाले अधिक से अधिक उद्योगों के जल शोधित यंत्र नहीं लगे हैं। बड़े उद्योगों ने तो अपने औद्योगिक कचरे के निस्तारण के उपाय किये हैं पर छोटे तथा मध्यम दर्जे के उद्यागों ने इन पर होने वाले व्यय को देखते हुए, इसे नहीं अपनाया है। उनका लाभ की स्थिति में न होना या बहुत कम लाभ होना भी, इसमें बाधक है।

रासायनिक प्रदूषण

तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक देशों जैसे भारत में, स्थानीय जनता को प्रदूषण से होने वाले खतरों को अनदेखा कर दिया जाता है। भोपाल की गैस-त्रासदी इसका एक उदाहरण है।

रासायनिक प्रदूषण को पूरे देश में तेजी से अनुभव किया जा रहा है। यह पाया गया है कि गैर औद्योगिक क्षेत्रों की तुलना में, औद्योगिक क्षेत्रों में तरह-तरह के कैन्सर, विभिन्न त्वचा की बीमारियाँ, जन्मजात विकृतियों, आनुवांशिक असामनता भी लगतार बढ़ रही है, स्वाभाविक साँस लेने की, पाचन की, रक्त बहाव की, संक्रामक आदि बीमारियों में चौगुना बढ़ोत्तरी हुयी है।

भारत सकरार की 'नेशनल जियाफिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी' के सर्वेक्षण के अनुसार, 1970 के दशक के साथ ही औद्योगिकीकरण ने भारत के शान्त मैदानों, झीलों, झरनों का परिदृश्य बदल दिया है जहरीले भारी रासायनिक तत्वों से धरती के अन्दर का जल, निरन्तर प्रभावित हो रहा है।
                                वर्तमान भारत और सुपर पॉवर का सपना




  भारत उन  विकासशील देशो की श्रेणी में आता है  जो  तेज़ी से विकास कर रहे  है  ।  जिसे २०३० तक सुपर पॉवर के नाम से जाना जाएगा , आने वाले समय में  जिसका डंका हर देश में बजेगा , हर कोई इस देश की सफलता एवं उपलब्धियों  को सराहेगा।  कुछ ऐसा ही सपना हम सब सजा रहे है , पर क्या वास्तव में ये सपना हकीकत बनेगा ? अगर आज हम अपने वर्तमान की स्थिति  को देखकर इस बात का अनुमान लगाये तो आने वाले १७ सालो में क्या बल्कि कई सालो में भी हम इस सपने को साकार नहीं कर पाएंगे।

    आजादी के ६ दसको बाद भी देश की स्थिति में कुछ ज्यादा सुधार नहीं हुआ।  हम उस भारत के निवासी है जहाँ आजादी के इतने लम्बे समय  बाद भी साक्षरता दर ७४ % है  आजादी के बाद से अब तक कई लोग देश की सत्ता में आये गए पर  देश की साक्षरता दर में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं कर सके।  देश के युवा नौकरी के तलाश में दर - दर की ठोकरे खा  रहे है  और हतोत्साहित हो कर या तो  आत्महत्या कर लेते है या अपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते है।  पूरे विश्व में युवाओ की सबसे ज्यादे संख्या  हमारे देश में है , पर अफ़सोस इस बात का है कि ये युवा सिर्फ भीड़ बढाने का काम करते है , और इसमें उनका कोई दोष नहीं  है बल्कि देश के नीति नियंता इसके लिए जिम्मेदार है। देश की महिलाओं को स्वतन्त्रता के नाम पर घर की चार दीवारियो के भीतर रखा जाता है।  आज भी अधिकांश महिलाओं के बारे में  फैसला उसके परिवार के लोग लेते है फिर चाहे इसमें उसकी ख़ुशी हो या समझौता।  कहने को तो संविधान लड़का - लड़की को बराबर अधिकार दिया है पर ये अधिकार केवल पन्नो में ही सीमित है।

    वर्तमान भारत की स्थिति ये है की कोई महिला  बाहर निकले तो उसकी सलामती के लिए घर वाले उसके साथ अलग से एक दो सदस्य भेजते है और हर दस मिनट में उसकी सलामती की खबर लेते रहते है।  देश के नीति नियंता जिनके ऊपर  देश के विकास सम्बंधित जिम्मेदारी है वो अपनी ताकत का दुरुपयोग कर कभी २ जी , कोल माइन , कॉमन गेम तो कभी एन आर एच एम् जैसे घोटालो से देश का दिवाला निकालते है।  दिन प्रतिदिन रुपये की गिरती हालत एवं  बढती महंगाई लोगो  का जीना मुश्किल कर  दिया है , देश की जी डी  पी अब तक के अपने सबसे निचले स्तर ४.४० पर आ गयी है।  यही नहीं देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चे ढाबे पर चाय देने  व सड़क पर लोगो के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है , देश के ४२% बच्चे कुपोषण के शिकार है।

 देश की सरकार लोगो को उनका हक देने के जगह उन्हें अधिक गरीब कम गरीब की श्रेणी में बाटकर  चुनावी लोलीपोप से उनका पेट भरने की कोशिश में लगी है।  राजनेता राजनैतिक स्वार्थ के लिए कभी दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे इमानदार अधिकारी को सस्पेंड करते है तो कभी फैजाबाद , मुज्जफरनगर जैसे सांप्रदायिक दंगो को जन्म देते है । यही नहीं देश के संविधान के अनुसार लोगो को वाणी एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मिली है पर  कोई किसी के खिलाफ अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करे तो उसे जेल जाना पड़ता है।

 ऐसे  ही न जाने कितनी समस्याएं हमारे देश में है , और जब तक इन समस्याओं को खत्म नहीं किया जा सकता सुपर पॉवर का ये सपना सिर्फ सपना ही रह जाएगा।  
                                          बयानों  पर बेबुनियादी आक्रमण .......



आज के वर्तमान  राजनीति का  परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है।  आज के राजनीति में रहना एवं लम्बे समय तक बने रहने के लिए नेताओं को बड़ी मशक्कत करनी होती है।  वर्तमान राजनीति  का जो मुख्य आधार एवं मुख्य कड़ी है वो है किसी  की बातों को तोड़मरोड़   अपने स्वार्थपूर्ति के लिए कहना। बात में कितनी सच्चाई कितनी नैतिकता  हो  इससे मतलब नहीं होता , बल्कि मतलब इससे  होता है कि राजनेताओ को  ऐसी बातो से  उन्हें कितना फायदा होता है।  ऐसा ही हुआ जब गुजरात के मुख्यमंत्री  व भाजपा  प्रधानमंत्री पद  उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में आयोजित एक विशाल रैली को संबोधित किया।

     रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि ' पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री को 'देहाती औरत ' कहा   किसी भी देश के लिए उस देश का प्रधानमंत्री  मुख्य व्यक्ति होता है, देश की पहचान व नेतृत्व  प्रधानमंत्री  के द्वारा होती  है , ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री को देहाती औरत कहने से बड़ा हमारे देश का अपमान और कुछ हो ही नहीं सकता। नवाज शरीफ द्वारा भारतीय प्रधान मंत्री को देहाती औरत कहने के पीछे राजनीती में माहिर मोदी ने बड़े  चतुराई से इसको कांग्रेस के अन्दर मतभेद का जामा पहना दिया।  मोदी ने कहा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ऐसा दुस्साहस इसलिए किये क्योंकि प्रधानमंत्री की खुद उनकी ही पार्टी में कोई इज्जत  नहीं है , तो हम दुसरे देश के लोगो से क्या अपेक्षा करेंगे ? इसबात  की पुष्टि करने के लिए राहुल गाँधी द्वारा  हाल  ही में संप्रग द्वारा लाये गए आध्यादेश पर प्रधानमंत्री को बकवास करने की बात का  हवाला देते हुए कहा जब पार्टी के  युवा नेता व उपाध्यक्ष  खुद अपने प्रधानमंत्री को नोंसेंस कहते है तो दूसरो की हम क्या बात करें ?

     मोदी के इस संबोधन से सिर्फ सियासी गलियारे  ही नहीं  बल्कि पूरे भारत में ये एक चर्चा का विषय बन  गया। दिल्ली रैली में  मोदी ने  नवाज शरीफ द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री को देहाती औरत कहने की बात को अपने संबोधन का सबसे  बड़ा हथियार बना  लिया।  पर यहाँ दो बात गौर करने की है कि बताया जाता है कि डॉ मनमोहन सिंह के बारे में विवादास्पद   बयान नवाज शरीफ न्यूयोर्क में 'जियो टीवी' के एंकर हामिद मीर व एन दी टीवी ग्रुप एडिटर बरखा दत्त के साथ निजी बात चित के दौरान कही पर   इन दोनों पत्रकारों ने इस बात की पुष्टि की है क़ि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ भी आपत्तिजनक बात नहीं कही है।  दूसरी बात ये गौर करने की है , क़ि कुछ दिन पहले संसद के मानसून सत्र के दौरान भाजपा नेता ने प्रधानमंत्री डॉ  मनमोहन  सिंह को चोर बताया था , तब  मोदी को प्रधानमंत्री एवं उनके साख के बारे में ख्याल नहीं आया  , कि इससे हमारे देश के प्रति लोगो की क्या मनोदशा होगी।
     राजनीति  में आज कल बयानों पर बेबुनियादी आक्रमण का दौर सा चल गया है।  किसी की भी बातो को तोड़ मरोड़ कर बताना आज की राजनीति का ट्रेंड बन  गया है। 

Tuesday, 1 October 2013

                           अमेरिका तय करेगा भारत का अगला प्रधानमंत्री ...

       

 भले ही भारतीय राजनीति  में  राहुल गाँधी एवं नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की जंग छिड़ी हो पर , भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा ये अमेरिका तय करेगा।  जी हाँ चौकिये मत भारत के दो सबसे बड़े राजनितिक दल कांग्रेस एवं भाजपा चुनावी गुर एवं चुनावी प्रचार के तरीके अमेरिचाअ से सिख रहे है।  एक इनफार्मेशन के अनुसार जहां एक ओर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की सलाहकार 'स्टीफनी कटर' से प्रधानमंत्री बनाने के गुण सिख रहे है।  अब जब देश के बड़े राजनितिक दल कांग्रेस  विदेशो से राजनीती के गुण  सिख रहे है तो ये बात भाजपा को कैसे पचती ? तभी तो भाजपा भी चुनावी दाव  - पेंच सीखने  अमेरिका जा पहुचा।

   एक रिपोर्ट के अनुसार गुजरात के मुख्य  मंत्री व भाजपा प्रधानमंत्री  पद  के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी खुद को भारत का अगला प्रधानमंत्री  बनाने का ठिका अमेरिका के ही एक लाबिंग  कंपनी एवं पी. आर. एजेंसी 'एप्को वर्ल्ड वाइड' को दे रखा है।   फेसबुक से लेकर कॉमिक्स  बुक एवं रेडियो से लेकर टेलीविज़न तक हर जनमाध्याम  पर नरेन्द्र मोदी का डंका पिटवाने वाली ये एप्को पी आर कपानी ही है। ये एप्को कंपनी वही है जो नरेन्द्र मोदी के गुजरात मॉडल को पुरे विश्व में चर्चा का विषय बनवा दिया था जिससे प्रभावित हो देश की ही नहीं वरन विदेशो की भी बड़े  - बड़े  उद्योगपति  गुजरात में अपनी कंपनी डालने को सोचने लगे।   यही नहीं एप्को कंपनी नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनवाने के लिए ७०० करोड़ रुपये का चुनावी मदद भी करवा रही है।

    मोदी के सारे  चुनाव प्रचार की तैयारी मोदी के भाषण  उनकी रैली इत्यादि सभी कामो का जिम्मा ये एप्को कंपनी ही उठा रही है।  मोदी की लोकप्रियता को बढाने के लिए कंपनी ने मोदी के नाम पर गेम भी बनायीं है जिसमे नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार को मरते हुए दिखाए गए है।  इस कपानी का  मोदी के साथ २००७ के आस - पास नाता जुदा  है, शुरूआती समय में कंपनी सिर्फ मोदी के लिए काम करती थी पर मोदी कहने पर अब ये पुरे भाजपा के लिए काम कर रही है।

   बात यहाँ गौर फरमाने की है कि ये वही मोदी है जो अंग्रेजी विरोधी माने जाते है , और इनके पार्टी के शीर्ष नेता व  भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कहना है कि  भारत को सबसे अधिक अंग्रेजी भाषा से  छति  पहुची है इस भाषा ने हमारी संस्कृति एवं हमारे समाज पर बड़ा ही नकारात्मक प्रभाव डाला है। एक ओर  जहाँ पार्टी के नेताओं का ऐसा मानना है वही दूसरी ओर  खुद  के स्वार्थ पूर्ति के लिए उसी अंग्रेजी लोगो एवं भाषा का प्रयोग कर रहे है।  
                                                                 नादानी..... 

नादानी एक ऐसा शब्द है जो हम सब के जिन्दागी के साथ जुड़ा  है।  मै  आप हम सब  कभी ना कभी छोटी बड़ी नादानी करते रहते है , और बेसक हमें उसका हिसाब भी चुकता करना पड़ता है। हमारी  नादानी कभी सिर्फ हमारे लिए तो कभी हम सब के लिए मुसीबत बन जाती है।  गलती कोई एक करता है और सजा हम सबको भुगतना पड़ता है। ऐसी ही एक छोटी सी नादानी की कहानी आज मै  आप  को बात रहा हूँ  जिसका परिणाम बहुत बुरा था।

      कुछ साल पहले खुशहालपुर गावं में ग्राम प्रधान चुनाव का माहौल था , हर गली ,चौराहे और नुक्कड़ पर चुनाव को लेकर चर्चाये चल रही थी। चुनावी बिगुल बजते  ही सभी उम्मीदवार अपने लोक लुभावने वादों को लेकर जनता जनार्दन के घर की ओर चल पड़े थे । खुशहाल पुर गावं में पंद्रह सदस्यों वाले कन्हैया लाल के ऊपर सभी प्रत्याशियों की नजर थी। भला हो भी क्यूँ न…… आखिर सवाल पंद्रह वोटों का जो है ? चुनावी मैदान में मुख्य  रूप से दो प्रत्याशी आमने सामने थे , जिसमे पहला नाम दो बार से लगातार प्रधान रहे सेठ दीनानाथ और दूसरा नाम गावं का एक किसान भोला राम था।  सेठ दीनानाथ जितना ही नाम से बड़ा है  उतना ही दिल से छोटा। दिना नाथ के पास कई एकड़ जमीन , तबेला एवं गल्ले  की दुकान  है  जिसके दम पर वो अपनी राजनीती सिद्ध करता है। गावं में रहने वाले दबे - कुचले वर्गो के लोग उसकी दिहाड़ी मजदूरी करते थे , जिसके बदले में दिना नाथ उनको राशन का सामान देता था।  जहाँ एक ओर दिना नाथ किसानो से अधिक काम लेता था वहीँ राशन  देते समय वजन में चुना भी लगता था। चुनाव के दुसरे प्रत्याशी भोलाराम के पास लोगो को देने के लिए कुछ भी न था , सिवाय  उसकी इमानदारी एवं कुशल व्यवहार के।

      दोनों प्रत्यशियों ने चुनावी प्रचार के लिए जम  कर पसीने बहाये  और अपने अपने तरीको से गावं वालो को अपने पाले में लाने की कोशिश की। मतदान से ठीक  एक दिन  पहले सेठ दीनानाथ ने अपने पैसे का दम दिखाया और हर किसी को तोहफे देकर खरीदना चाहा , पर पिछले दस सालो से दीनानाथ के लूट खसोट एवं ढुलमुल रवैये से जूझ रहे गावं वाले किसी तरह दीनानाथ से छुटकारा पान चाहते थे। हालाँकि उनमे से कुछ दीनानाथ के बहकावे में आ गए पर दिना नाथ का सबसे बड़ा निशाना कन्हैया लाल का परिवार था। मतदान वाली सुबह से पहले दीनानाथ कन्हैया के घर पर पहुंचा और नोटों की कुछ बण्डल उसके हाथो में देते हुए कहा कि ' जितने के बाद तुम्हारी  बेटियों की शादी एवं लडको के  नौकरी की जिम्मेदारी मेरी '

     समय की मार एवं गरीबी से बेहाल कन्हैया को कुछ भी ना सुझा और तुरंत पैसो को जेब में रख लिया और दीनानाथ को भरोसा दिया कि उसके घर का सारा वोट दीनानाथ को जाएगा। अब सेठ पूरी तरह आश्वस्त हो गया था कि उसकी जीत पक्की है। आखिर कार मतदान  का दिन आ गया लोग भरी संख्या में मतदान किये।  मतदान के बाद सबका  ध्यान चुनाव परिणाम की तरफ था। सबके होश उड़ गए जब उन्हें पता चला कि दीनानाथ बारह मतों से विजयी हो गया। अब दीनानाथ के ख़ुशी का ठिकाना ना रहा और वो अपने जीत के जश्न में डूब गया उधर दूसरी ओर गरीब भोला नाथ के साथ - साथ गावं वालो की  भी उम्मीदों  का सूरज ढल गया।
    कुछ दिनों बाद जब गावं के लोग दीनानाथ के पास स्कूल व हैंडपंप को बनवाने को लेकर उसके किये हुए वादे की याद दिलाने पहुचे तो , दीनानाथ सब कुछ भूलते हुए आक्रामक तेवर में लोगो से कहा कि कैसा स्कूल कैसा नल ? इस चुनाव में मेरे पूरे दस हजार रुपये खर्च हुए है , जब तक मै  उन पैसो की भरपाई नहीं कर लेता गावं के विकास के बारे में सोच भी नहीं सकता। दीनानाथ की बातें सुनकर लोगो को बड़ा आघात पहुंचा , पर वो कर भी क्या सकते थे ?  गावं वालो से छुपकर कन्हैया जब दीनानाथ से अपनी बेटियों की शादी के बारे में पूछा तो दीनानाथ ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि कैसा वादा  ?  तेरे एक - एक वोट को मैंने खरीदा है जा जाकर खेतो के बाकी काम पूरा कर। ये सुनकर कनहैया  लाल अपने किये पर फफक - फफक कर रोने लगा और तब उसे एहसास हुआ कि  कैसे उसकी  एक छोटी सी नादानी उसके घर और पुरे गावं के लिए अभिशाप बन गयी।

     याद रहे कि २०१४ का आम चुनाव आने वाला है , और सेठ दीनानाथ की तरह कई प्रत्यासी हमारे सामने होंगे। " उंगली पर लगाने वाला ये छोटा सा निशान  देश के मस्तिषक पर तिलक भी लगा सकता है और कलंक भी "

Monday, 30 September 2013

                         अच्छी फिल्मो की धीमी शुरुआत……..

    बॉलीवुड का अंदाज एवं फिल्मो के सक्सेस की कहानी हमेशा बदलती रहती है।  किसी जवाने में लाख तो करोड़ तो सौ करोड़ और अब कितने कम समय में सौ करोड़ कमाया जाये ये फिल्मो के मॉडर्न एर के सक्सेस की कहानी हो गयी है। अक्सर ऐसा होता है जब अच्छी  फिल्मे शुरूआती दौर में अच्छा बिज़नस नहीं कर पाती , और वो धीरे - धीरे  सफलता की सीढ़ी चढ़ती है।  पर विडंबना ये है की लोग उसके पहले दिन की कमाई से उसे सफल या असफल मूवी क्षेत्र में रख देते हैं।
     कुछ समय पहले रिलीज़ हुई दो फिल्मो  को अगर हम सक्सेज की तराजू पर रख कर देखें तो फिल्मे दोनों अच्छी रही। पर दोनों की शुरुआत अलग रही। जहाँ एक ने पहले ही दिन ३३ करोड़ का बिज़नेस किया वहीँ दुसरे ने करोड़ से ओपनिंग की। मै बात कर रहा हूँ रोहित शेट्टी निर्देशित फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस एवं सुजीत सरकार की मद्रास कैफे।
  अब अगर बात करें चेन्नई एक्सप्रेस की तो फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ऐतिहासिक  शुरुआत की , और अब तक के हाईएस्ट ओपनिंग कमाई 'एक था टाइगर ' का भी रिकॉर्ड तोड़ दी। पूरी मूवी में एक दो डायलोग एक दो सीन को छोड़कर मूवी क्या है मुझे समझ में ही नहीं आया ?
फिल्म में वही घिसे पिटे पुराने डायलोग एवं एक्शन सीन्स को दोहराया गया है।  अब बात फिल्म के गानों की करें तो 'गेट ओन डांस फ्लोरछोड़कर कोई गाना दर्शको के  जुबान पर लम्बे समय तक नहीं रह सका। फिर भी फिल्म एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ती रही। 
  अगर अब बात दुसरे फिल्म यानी मद्रास कैफे की करें तो कहानी से लेकर फिल्मांकन तक डायलोग से लेकर लोकेशन तक हर कुछ दिल को छूता है। फिर भी पहले दिन के शो में अधिक से अधिक दर्शको को थिएटर की ओर नहीं खीच पाई।  फिल्म रिलीज़ होने के चार दिन बाद तक फिल्म का बजट भी नहीं निकाल पायी , हालाँकि कुछ दिनों बाद फिल्म अच्छा बिज़नस की।
        खैर ये तो दर्शको के मूड पर डिपेंड होता है कि वो किस प्रकार की फिल्मे देखना पसंद करते है।  और अक्सर लोग थिएटर सिर्फ एंटरटेन के लिए जाते है कम ही लोग फिल्मो को उसके  कहानी एवं  मैसेज के अनुसार देखते हैं।  पर विडम्बना ये है की लोग फिल्मो के पहले दिन की ही कमाई के अनुसार उसे सफल या असफल मूवी के कैटेगरी में रख देते हैं।

Sunday, 29 September 2013

                                                    हॉस्पिटल या बीमारी घर ?

हॉस्पिटल जहाँ हम अपनी बीमारियों के निदान के लिए जाते है , जहाँ से हमें किसी भी प्रकार के रोग एवं तालीफ़ से निजात मिलती है।  पर आप ने कभी सोचा है कि ऐसे कई हॉस्पिटल जो बीमारियाँ एवं घटक रोग फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।  जी हाँ हम बात कर रहे है उन सरकारी होस्पितालो की जहाँ लोग रोग से निजात के लिए जाते हैं , पर उनके साथ या कभी - कभी वो खुद किसी दुसरे बीमारी का शिकार बन जाते हैं।

      मुंबई के मुलुंड एरिया में एक सरकारी हॉस्पिटल है जहाँ कुछ दिन पहले मैं अंकल को लेकर गया था।  दरसल मेरे अंकल को मलेरिया की शिकायत थी।  हॉस्पिटल के डॉक्टर ने उन्हें एडमिट करे की सलाह दी।  जिस वार्ड में उन्हें रखा गया उस वार्ड में पहले से ही कई और मलेरिया के रोगी थे। वार्ड की हालत देख राम गोपाल वर्मा की हॉरर फिल्म का सीन याद आ रहा था।  सीलिंग पर लगा चुन जगह - जगह से छोड़कर गिर रहा था , वार्ड में पंखे तो थे पर उनकी रफ़्तार को आराम से गिना जा सकता था। लगभग हर बेड के पीछे खिड़की थी पर सुरक्षा के नाम पर उन खिडकियों में सिर्फ टूटे कांच थे।
  खैर ये तो हो गयी हॉस्पिटल की सुन्दरता की बाते पर जो असल मुद्दा है वो इससे कहीं और आगे है. मेरे अंकल को चार दिन तक वहां रखा गया था।  उन्हें मलेरिया से तो राहत मिल गयी  पर वार्ड में दबंगई से घुमाने वाले बड़े - बड़े मछरो के अटैक से उन्हें डेंगू हो गया साथ ही उनके देख रेख के लिए हॉस्पिटल में रहने गयीं मेरी आंटी को भी मलेरिया हो गया।

      अंकल के बाजू वाले खाट पर एक वृद्ध था जो पूरी तरह उठाने - बैठने में असमर्थ था नतीजन वो बीएड पर ही शौच करने को मजबूर था।  उस वृद्ध के बीएड पर फैले मल - मूत्र से सारा वार्ड बदबू कर रहा था , पर किसी भी वार्ड बॉय की न उनपे नजर पड़ती न ही वो वार्ड की इस दुर्गन्ध से परिचित हो पाते। हॉस्पिटल में बने शौचालय की हालत देख मई घबरा गया और जल्दी से बाहर निकल आया। शौचालय में इतनी गन्दगी थी कि कोई एक सेकंड भी वहां खडा ना हो पाए , पर वार्ड के सारे मरीज उसी सौचालय में जाने को मजबूर थे।

 अब जरा सोचिये किसी भी हॉस्पिटल की हालत इस तरह होगी तो वहां क्या होगा ? और वहां के मरीजो का हालत क्या होगा ? निश्चय ही  ऐसे वातावरण में अगर किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को भी   जानापड़े तो वो बीमार हो जाएगा।   सरकार द्वारा सीधे तौर पर संचालित होने वाले इन हॉस्पिटलो  में ऐसी लापरवाही  एवं   दैनीय स्थिति क्यों बनी है ?