Monday, 30 September 2013

                         अच्छी फिल्मो की धीमी शुरुआत……..

    बॉलीवुड का अंदाज एवं फिल्मो के सक्सेस की कहानी हमेशा बदलती रहती है।  किसी जवाने में लाख तो करोड़ तो सौ करोड़ और अब कितने कम समय में सौ करोड़ कमाया जाये ये फिल्मो के मॉडर्न एर के सक्सेस की कहानी हो गयी है। अक्सर ऐसा होता है जब अच्छी  फिल्मे शुरूआती दौर में अच्छा बिज़नस नहीं कर पाती , और वो धीरे - धीरे  सफलता की सीढ़ी चढ़ती है।  पर विडंबना ये है की लोग उसके पहले दिन की कमाई से उसे सफल या असफल मूवी क्षेत्र में रख देते हैं।
     कुछ समय पहले रिलीज़ हुई दो फिल्मो  को अगर हम सक्सेज की तराजू पर रख कर देखें तो फिल्मे दोनों अच्छी रही। पर दोनों की शुरुआत अलग रही। जहाँ एक ने पहले ही दिन ३३ करोड़ का बिज़नेस किया वहीँ दुसरे ने करोड़ से ओपनिंग की। मै बात कर रहा हूँ रोहित शेट्टी निर्देशित फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस एवं सुजीत सरकार की मद्रास कैफे।
  अब अगर बात करें चेन्नई एक्सप्रेस की तो फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ऐतिहासिक  शुरुआत की , और अब तक के हाईएस्ट ओपनिंग कमाई 'एक था टाइगर ' का भी रिकॉर्ड तोड़ दी। पूरी मूवी में एक दो डायलोग एक दो सीन को छोड़कर मूवी क्या है मुझे समझ में ही नहीं आया ?
फिल्म में वही घिसे पिटे पुराने डायलोग एवं एक्शन सीन्स को दोहराया गया है।  अब बात फिल्म के गानों की करें तो 'गेट ओन डांस फ्लोरछोड़कर कोई गाना दर्शको के  जुबान पर लम्बे समय तक नहीं रह सका। फिर भी फिल्म एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ती रही। 
  अगर अब बात दुसरे फिल्म यानी मद्रास कैफे की करें तो कहानी से लेकर फिल्मांकन तक डायलोग से लेकर लोकेशन तक हर कुछ दिल को छूता है। फिर भी पहले दिन के शो में अधिक से अधिक दर्शको को थिएटर की ओर नहीं खीच पाई।  फिल्म रिलीज़ होने के चार दिन बाद तक फिल्म का बजट भी नहीं निकाल पायी , हालाँकि कुछ दिनों बाद फिल्म अच्छा बिज़नस की।
        खैर ये तो दर्शको के मूड पर डिपेंड होता है कि वो किस प्रकार की फिल्मे देखना पसंद करते है।  और अक्सर लोग थिएटर सिर्फ एंटरटेन के लिए जाते है कम ही लोग फिल्मो को उसके  कहानी एवं  मैसेज के अनुसार देखते हैं।  पर विडम्बना ये है की लोग फिल्मो के पहले दिन की ही कमाई के अनुसार उसे सफल या असफल मूवी के कैटेगरी में रख देते हैं।

Sunday, 29 September 2013

                                                    हॉस्पिटल या बीमारी घर ?

हॉस्पिटल जहाँ हम अपनी बीमारियों के निदान के लिए जाते है , जहाँ से हमें किसी भी प्रकार के रोग एवं तालीफ़ से निजात मिलती है।  पर आप ने कभी सोचा है कि ऐसे कई हॉस्पिटल जो बीमारियाँ एवं घटक रोग फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।  जी हाँ हम बात कर रहे है उन सरकारी होस्पितालो की जहाँ लोग रोग से निजात के लिए जाते हैं , पर उनके साथ या कभी - कभी वो खुद किसी दुसरे बीमारी का शिकार बन जाते हैं।

      मुंबई के मुलुंड एरिया में एक सरकारी हॉस्पिटल है जहाँ कुछ दिन पहले मैं अंकल को लेकर गया था।  दरसल मेरे अंकल को मलेरिया की शिकायत थी।  हॉस्पिटल के डॉक्टर ने उन्हें एडमिट करे की सलाह दी।  जिस वार्ड में उन्हें रखा गया उस वार्ड में पहले से ही कई और मलेरिया के रोगी थे। वार्ड की हालत देख राम गोपाल वर्मा की हॉरर फिल्म का सीन याद आ रहा था।  सीलिंग पर लगा चुन जगह - जगह से छोड़कर गिर रहा था , वार्ड में पंखे तो थे पर उनकी रफ़्तार को आराम से गिना जा सकता था। लगभग हर बेड के पीछे खिड़की थी पर सुरक्षा के नाम पर उन खिडकियों में सिर्फ टूटे कांच थे।
  खैर ये तो हो गयी हॉस्पिटल की सुन्दरता की बाते पर जो असल मुद्दा है वो इससे कहीं और आगे है. मेरे अंकल को चार दिन तक वहां रखा गया था।  उन्हें मलेरिया से तो राहत मिल गयी  पर वार्ड में दबंगई से घुमाने वाले बड़े - बड़े मछरो के अटैक से उन्हें डेंगू हो गया साथ ही उनके देख रेख के लिए हॉस्पिटल में रहने गयीं मेरी आंटी को भी मलेरिया हो गया।

      अंकल के बाजू वाले खाट पर एक वृद्ध था जो पूरी तरह उठाने - बैठने में असमर्थ था नतीजन वो बीएड पर ही शौच करने को मजबूर था।  उस वृद्ध के बीएड पर फैले मल - मूत्र से सारा वार्ड बदबू कर रहा था , पर किसी भी वार्ड बॉय की न उनपे नजर पड़ती न ही वो वार्ड की इस दुर्गन्ध से परिचित हो पाते। हॉस्पिटल में बने शौचालय की हालत देख मई घबरा गया और जल्दी से बाहर निकल आया। शौचालय में इतनी गन्दगी थी कि कोई एक सेकंड भी वहां खडा ना हो पाए , पर वार्ड के सारे मरीज उसी सौचालय में जाने को मजबूर थे।

 अब जरा सोचिये किसी भी हॉस्पिटल की हालत इस तरह होगी तो वहां क्या होगा ? और वहां के मरीजो का हालत क्या होगा ? निश्चय ही  ऐसे वातावरण में अगर किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को भी   जानापड़े तो वो बीमार हो जाएगा।   सरकार द्वारा सीधे तौर पर संचालित होने वाले इन हॉस्पिटलो  में ऐसी लापरवाही  एवं   दैनीय स्थिति क्यों बनी है ? 
                                                धार्मिक आयोजन एवं प्रदूषण

 

 धार्मिक आयोजनों के वक़्त होने वाले प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य व वातावरण दोनों के लिए नुकसान देह है , फिर भी लोग ऐसा करने से ज़रा सा भी नहीं कतराते।  आज से कई सैकड़ो  वर्ष पूर्व ऐसे आयोजनों का सिर्फ एक मतलब हुआ करता था सच्ची भक्ति , पर आज इन आयोजनों का मतलब दिखावा, मस्ती एवं आस्था के नाम पर खिलवाड़ हो गया है।

      हमारे  देश के हर प्रदेश में ऐसे विभिन्न प्रकार के आयोजन होते है , कहीं दुर्गा पूजा तो कहीं कृष्ण उत्सव कहीं गणेश उत्सव तो कहीं शिव उत्सव।  ऐसे आयोजनों के वक़्त लोग वातावरण में कई प्रकार के प्रदुषण को जन्म देते है।  अगर हम बात ग्लैमर सिटी मुंबई की करे तो यहाँ का गणेश उत्सव भी काफी ग्लैमरस होता है।  आंकड़ो  के अनुसार हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर मुंबई में कई हजार मूर्तियाँ बनाई व बेचीं जाती है साथ ही हर साल इनमे ४ से ५ प्रतिशत नए आर्डर आते है।  इन मूर्तियों को बनाने में विभिन्न प्रकार के रासयनिक कलर एवं अन्य चीजो की जरुरत पड़ती है , जो वातावरण को प्रदूषित करती है। ऐसा ही कुछ हाल होता है कोलकाता में दुर्गा  पूजा के वक़्त। कोलकाता में दुर्गा पूजा के लिए बड़ी - बड़ी मूर्तियाँ एवं बड़े - बड़े पंडाल सजाये जाते है।  कुछ इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी दुर्गा पूजा के समय  होता है नवरात्री के मौसम में उत्तर प्रदेश में माँ दुर्गा की  मूर्तियाँ लायी जाती है।  इन उत्सवो के दौरान होने वाले धूम - धडाके एवं बड़े - बड़े लाउड स्पीकर्स से जहाँ एक ओर ध्वनि प्रदुषण होता है वहीँ दूसरी ओर बिजली की अधिक मात्रा में खपत भी बढाती है।

      प्रदुषण का अम्बार यही नहीं थमता और इन उत्सवो के बाद जब मूर्तियों को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है तब भी प्रदुषण का ढेर हमारे सामने होता है।   विसर्जन के लिए ले जाते वक़्त जहाँ एक ओर भक्तजन तेज आवाज वाले बम फोड़ते है वही दूसरी ओर अधिक मात्रा में एक दुसरे के ऊपर रंग गुलाल भी फेंकते है सात ही विसर्जन के दौरान बड़े - बड़े साउंड बॉक्स जिस भी क्षेत्र से गुजरता है मानो सबको बेहरा कर देता हो।  मिटटी की इन मूर्तियों को जाल में प्रवाहित करने से जल प्रदुषण बढ़ता है जिससे जल की शुद्धता प्रभावित होती है और जलीय जिव जन्तुओ का  जीवन  भी खतरे में पड़ता है। विसर्जन के वक़्त मूर्तियों के श्रींगार के लिए पहनाये जाने वाले आर्टिफीसियल आभूषण  एवं फूल माल लोग समुन्दर या नदी किनारे छोड़ चले जाते है जो कुछ दिन बाद सड़ना शुरू हो जाता है जिससे न केवल बदबू फैलाती है बल्कि पुरे वातावरण में असंतुलन पैदा होता है।
 
      बात यहाँ न केवल ये सोचने की है कि कैसे इन आयोजनों से प्रदुषण की मात्र हमारे वातावरण में बढ़ती  है , बल्कि ये भी सोचना है कि सच्ची भक्ति एवं इश्वर के प्रति आस्था का मूल  मतलब  क्या है ? क्या भगवान् के  पूजा पाठ के दौरान ऐसे बड़े - बड़े लाउड स्पीकर्स एवं शोर शराबे आज के मॉडर्न युग की नयी भक्ति है ? मेरा उद्देश्य किसी के आस्था पर निशान साधना नहीं है , बल्कि ऐसे आयोजनों के वक़्त की जाने वाली अंधा धुंध प्रदुषण की बौछार से लोगो को आगाह करना है। 
                        हिंदी की स्थिति ..........

आज  मै  इस तथ्य पर चर्चा नहीं करने जा रहा हूँ कि हिन्दी का प्रयोग देशभर
में क्यों नहीं हो रहा है,हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा के जगह पर सिर्फ
राजभाषा ही क्यों है और आज हिन्दी के पतन का क्या कारण है ?हिन्दी की
महत्त्व कितनी है, हिन्दी का वजूद क्या है,हिन्दी का प्रभाव क्या
है,हिन्दी को संरक्षित क्यों करना चाहिए ?,ये हमारी चर्चा का विषय नहीं
है।हमारी चर्चा का विषय मौलिक अधिकारों के दायरे में है।आखिर हिन्दी के
जगह पर कई स्थानों पर अंग्रेजी को थोपना हमारी मौलिक अधिकारों का हनन किस
रुप में करता है,ये हमारी चर्चा का विषय होना चाहिए।
हिन्दी या अपने क्षेत्रीय भाषा के सिवाय जिस व्यक्ति को अंग्रेजी नहीं
आती,उस पर भी सरकारी और न्यायालयी कामकाज में अंग्रेजी क्यों थोप दी जाती
है?भाषा को लेकर बनाया गया कानून दमनकारी है।जब अनुच्छेद 120 और 210 के
तहत क्रमशः संसद और विधानसभा के बहस का भाषा अंग्रेजी,हिन्दी अन्य सभी
है,जब अनुच्छेद 343 और राजभाषा अधिनियम,1963 के तहत सरकारी कामकाज का
भाषा अंग्रेजी और हिन्दी दोनों है,जब अनुच्छेद 351 के तहत संघ हिन्दी के
प्रचार-प्रसार के लिए बाध्य है,जब अनुच्छेद 350 के तहत किसी भी भाषा में
सरकारी कार्यालय में याचिका देन का नियम है और जब संविधान की आठवीं
अनुसूची में 22 भाषाओं को शामिल किया गया है फिर अनुच्छेद 348 के तहत
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में सिर्फ अंग्रेजी का ही प्रयोग
क्यों होता है?क्योंकि लोग सरकार और प्रतिवादी के खिलाफ आवाज ना उठा
सके।आम लोगों के पास कोर्ट के साथ अन्य सारे सरकारी,निजी संस्थाओं का
पत्र भी अंग्रेजी में ही भेजी जाती है जबकि उसके क्षेत्रीय भाषाओं में भी
भेजी जा सकती है।
लोगों को शांत बनाए रखने का सबसे बड़ा तरीका उस पर अंग्रेजी थोपकर कुछ
समझने का मौका ही नहीं देना है क्योंकि समझ आने पर लोग विरोध करेंगे ।इस
बात को सांसदों और विधायकों वगैरह भी स्वीकार करते हैं कि अंग्रेजी खुद
उन्हें भी समझ में नहीं आती या काफी कम समझ में आती है।क्योंकि अनुच्छेद
120 और 210 के तहत क्रमशः संसद और विधानसभा में ये लोग हिन्दी अन्य
क्षेत्रीय भाषाओं में भी बहस कर सकते हैं लेकिन इन्हीं नेताओं ने उच्च
न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के बहस का भाषा अंग्रेजी बना रखा है ताकि
लोग इनका विरोध ना कर सके। सर्वप्रथम भाषा से जुड़ी कानून में व्यापक
संशोधन की जरुरत है।अनुच्छेद 343 और राजभाषा अधिनियम,1963 के तहत कहा गया
है कि सरकारी कामकाज का भाषा हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा।लेकिन आम
लोगों के लिए उसके समझ के मुताबिक किस भाषा का प्रयोग किया जाए,इसका
प्रावधान नहीं किया गया है।राजभाषा अधिनियम,1963 के तहत अंग्रेजी के साथ
विधेयक,अध्यादेशों का अनुवाद हिन्दी में भी होना चाहिए।अनुच्छेद 345 के
तहत राज्य अपने कामकाज के लिए क्षेत्रीय भाषाओं या हिन्दी को लागू कर
सकती है।
अनुच्छेद 347 के तहत यदि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग अपने
लिए किसी स्थानीय भाषा को सरकारी मान्यता देने की अनुमति मांगते हैं तो
राष्ट्रपति सरकारी मान्यता दे सकते हैं।लेकिन इस बात का प्रावधान नहीं
किया गया है कि लोगों के साथ किस भाषा में संवाद किया जाए।यही कारण है कि
बैंक,सरकारी निजी संस्थाओं के पत्र सभी को अक्सर अंग्रेजी में ही लिखा
जाता है जिसे आम आदमी समझने में नाकाम रहते हैं।अतः इस बात का प्रावधान
किया जाना चाहिए कि लोगों से संवाद उसके समझ के भाषा में ही हो।
अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब होता है कि हमें
हमारी भाषा में अभिव्यक्ति प्रकट करने की आजादी होना चाहिए।इसलिए उच्च
न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी लोगों के समझ के भाषा में भी
बहस होना चाहिए।अन्यथा अंग्रेजी को थोपना अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के

मौलिक अधिकार का हनन है।

Wednesday, 25 September 2013

                                                 संसद के सन्नाटे की कहानी   




संसद भवन,  जहाँ सरकार  के नीति नियंता देश में विकाश  से सम्बंधित नीतियों को कानूनी जमा पहनने को प्रस्तुत करते है।  संसद भवन में प्रस्तुत बिधेयक दोनों सदनों (लोक सभा , राज्य सभा ) में बहस के बाद राष्ट्रपति के यहाँ हस्ताक्षर के लिए जाता है , तथा राष्ट्रपति के सहमती के बाद वो कानून बन जाता है। संसद भवन में प्रस्तुत होने वाले नेतागण जितने महत्वपूर्ण होते है उससे भी महत्वपूर्ण होता है संसद का समय , पर बिडम्बना यह है की संसद के कार्यवाही में अक्सर व्यवधान उत्पन्न होता है।
        पिछले  दो वर्षो  के दौरान अक्सर संसद की कार्यवाही पूरी तरह से ठप रही।  कार्यवाही के ठप  होने का ठीकरा अक्सर पक्ष विपक्ष एक दुसरे पर फोड़ते रहे है।  देश में सत्तारूढ़ यू पी ए २ संसद भवन की कार्यवाही में अवरोध उत्पन्न  होने का पूरा जिम्मा विपक्षी  दल पर थोपती है।  यू पी ए  २ का कहना है की भाजपा किसी भी तरह संसद की कार्यवाही को सकुशल चलने नहीं देती। पर अगर हम ध्यान से सोचे तो संसद की कार्यवाही ठप करने में सिर्फ विपक्ष जिम्मेदार नहीं है , बल्कि सड़क पर हो रहे आन्दोलन एवं सरकर  के अपने साथी भी जिम्मेदार है। इस बात का अंदाजा अन्ना  हजारे  एवं केजरीवाल के जन आन्दोलन एवं रेलवे किराया बढ़ने पर तृणमूल का सरकार  से समर्थन वापस लेने से पता चलता है।  साथ ही हम एफ डी  आई एवं प्रमोशन में आरक्षण सम्बंधित विषयों पर ध्यान दे तो संसद में सभी दलों  की आम सहमती न बनाने के कारण  भी संसद की कार्यवाही ठप रही। संसद  के सदनों में हो रहे इस प्रकार के व्यवधान से जहा एक ऒर कई महत्वपूर्ण विधेयक पास होने से वंचित रह जाते है , वही दूसरी ऒर संसद पर खर्च होने वाला धन भी व्यर्थ जाता है।
              संसद के  कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न होने से सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है  क्योकि सदन की कार्यवाही जनता के विकास  एवं  जनता द्वारा दिए 'कर ' से चलती है।  अतः सरकार को अपनी जनता एवं उनके हित को ध्यान में रखकर ऐसे व्यवधानों को ख़त्म करने की रह तलाशनी चहिये.    

Saturday, 14 September 2013

                                            Social media unsocial activity 

                                                                 
सूचना क्रांति ने पुरे  विश्व  एक गावं में बदल दिया है। सूचना तंत्र के इस जाल ने खासकर इन्टरनेट हमारे जीने के तरीको में मनो एक नयी क्रांति ला दी हो। देश दुनिया में हो रहे परिवर्तन या नए आयामों से हम इन्टरनेट के माध्यम से रूबरू होते है। इन्टरनेट आधारित सोशल नेटवर्किंग साइट्स ( फेसबुक ट्विटर गूगल ) जहा हमें अपनो से दूर लोगो के साथ इंटरेक्शन करने का मौका देती है , वही आम इन्सान को सहभागी होने का अवसर भी देती है ।  सोशल नेटवर्किंग साइट्स अन्य जन माध्यमो के तुलना में कही ज्यादा ही प्रभावशाली है ,……. हो  भी न क्यों आखिर बात सहभागिता की जो है ?
         वर्तमान में  किसी भी लोकतान्त्रिक देश में आम आदमी का जो सबसे अहम् एवं प्रभावशाली हथियार है वो है सोशल नेटवर्किंग साइट्स।  पर आज हम इस हथियार को किस रूप में प्रयोग कर रहे है यह एक बड़ा प्रश्न है।  वास्तव में क्या हम ऐसे साइट्स को सोशल तरीके से प्रयोग कर रहे है ? संभवतः अगर इस पर सर्वे करे तो पाएंगे की अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अनसोशल हरकत करते है।  वाणी एवं अभिव्यक्ति के नाम पर लोग अक्सर मनमानी करते है।  इसका उदहारण ऐसे साइट्स पर देखे जा सकते है।  समाज में बढ़ रहे अपराध , भ्रष्टाचार, महंगाई  इत्यादि ऐसे कई सामाजिक समस्याएँ है जिसके लिए हम सरकार को जिम्मेवार ठहराते है और कड़ी आलोचना करते है।  पर जिस तरह से हम रोष व्यक्त करते है क्या वो एक सोशल समाज को सोभा देती है ? देश के राजनेताओ के आपत्ति जनक फोटो एवं विडियो जिस तरह इन साइट्स पर देखे जाते है , उससे न केवल उनके सम्मान पर आंच आती है , वल्कि हमारे देश की छवि  भी अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर  धूमिल होती है।  गाली - गलौज , अश्लीलता , हिन्स्सा इत्यादि ऐसे अनेक असामाजिक हरकत दिन प्रतिदिन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बढ़ रहें है , जो समाज के लिए चुनौती बनती जा रही। 
       समय रहते ही हमें ऐसी समस्याओ पर ध्यान देना होगा और ऐसे अनैतिक कार्यो पर रोक लगाने के तरीके इजाद करने होंगे साथ ही अपने कार्यप्रणाली  में भी बदलाव लाना होगा।  

Wednesday, 11 September 2013

                                              सीरीयल्स  की   सिली कहानी

 सीरियल्स हमेशा से हमारे मनोरंजन करने का एक अच्छा  माध्यम रहा है।  दिन भर की थकन ,तनाव  के  बाद जब हम घर  आते है तो टेलीविज़न देख कर खुद का मनोरंजन करते है।  घर में काम करने वाली महिलाओ के लिए तो टेलीविज़न एक वरदान जैसा है उनके अकेलेपन , एवं मानसिक शारीरिक थकावट जैसी तमाम समस्याओ का सिर्फ एक समाधान है सीरियल्स।  आज अगर टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल्स की बात करे तो ,उनकी एक अलग ही कहानी हो गयी है।  भले ही विभिन्न चैनलो पर विभिन्न नामो से सीरियल्स आते है , पर अगर धयान से सोचे तो उन सब की कहानी एक जैसी चलती है।  वर्तमान में टीवी सीरियल्स पर जो एक नयी हवा चली है वो है "पुनर्विवाह  "  मेरा मकसद पुनर्विवाह का बिरोध करना नहीं है , बल्कि हर चैनल पर दिखाई जा रही इस कहानी से लोगो को रूबरू करना है।   आज किस तरह से हर चैनल इस कांसेप्ट को अपनी कहानी का हिस्सा बना रही है, किस तरह दूसरी तीसरी शादियों का किस्सा हर सीरियल्स में आ रहा है इसका उदाहरण स्टार प्लस ,जी टीवी , कलर्स एवं सोनी पर धिकाए जा रहे धारावाहिकों से पता चलता है।  अगर बात हम स्टार प्लस की करे तो इस पर दिखाए जाने वाला  फेमस धारावाहिक प्रतिज्ञा में कोमल की एवं  शक्ति की दुबारा शादी होती है , वही धारावाहिक में मुख्य किरदार में रहे सज्जन सिंह की भी दो शादियाँ दिखाई गयी थी।  जी  टीवी प्रसारित होने वाली पुनर्विवाह की  तो कहानी ही दूसरी विवाह का था।  अब जब दो लीडिंग चैनल्स पुनर्विवाह जैसे कहानी  को अपने धारावाहिक  का हिस्सा बना रहे है तो कलर्स कैसे पीछे रह सकता है।   कलर्स के धारावाहिक उतरन की बात करे तो "इच्छा"  की शादी पहले "वंश"  से होती है तथा दूसरी शादी वीर से होती है।  उतरन के एक दूसरी पात्र "तपस्या"  की पहली शादी वीर से वही दूसरी शादी राठौर से होती है।  इस धारावाहिक में पुनर्विवाह की कहानी यही नहीं थमती मनो ये इस सीरियल की परंपरा बनती जा रही है उतरन में ही इच्छा की बेटी मीठी की भी पहली शादी आकाश से होती है और दूसरी विष्णु से होती है।  कलर्स के ही एक अन्य सीरियल "ना  बोले तुम न मैंने कुछ कहा" की भी कहानी दूसरी शादी के ही  इर्द गिर्द घुमती है इस धारावाहिक में मेघ की पहली शादी अमर ब्यास से होती है तथा दूसरी मोहन भटनागर से होती है।  कलर्स चैनल की टी आर पी बढ़ने वाली धारावाहिक "वालिका बधू " की भी  कहानी यही सब बयां करती है, "ससुराल सिमर" का नमक धारावाहिक भी इसी प्रकार की स्टोरी से आगे बढ़ रही है
   अब जो मुख्य बात है , वो है कि  क्या ऐसे धारावाहिकों के स्क्रिप्ट पहले से ही ऐसी लिखी जाती है या सिर्फ टी आर पी के लिए ये सब होता है ?