Tuesday, 1 October 2013

                                                                 नादानी..... 

नादानी एक ऐसा शब्द है जो हम सब के जिन्दागी के साथ जुड़ा  है।  मै  आप हम सब  कभी ना कभी छोटी बड़ी नादानी करते रहते है , और बेसक हमें उसका हिसाब भी चुकता करना पड़ता है। हमारी  नादानी कभी सिर्फ हमारे लिए तो कभी हम सब के लिए मुसीबत बन जाती है।  गलती कोई एक करता है और सजा हम सबको भुगतना पड़ता है। ऐसी ही एक छोटी सी नादानी की कहानी आज मै  आप  को बात रहा हूँ  जिसका परिणाम बहुत बुरा था।

      कुछ साल पहले खुशहालपुर गावं में ग्राम प्रधान चुनाव का माहौल था , हर गली ,चौराहे और नुक्कड़ पर चुनाव को लेकर चर्चाये चल रही थी। चुनावी बिगुल बजते  ही सभी उम्मीदवार अपने लोक लुभावने वादों को लेकर जनता जनार्दन के घर की ओर चल पड़े थे । खुशहाल पुर गावं में पंद्रह सदस्यों वाले कन्हैया लाल के ऊपर सभी प्रत्याशियों की नजर थी। भला हो भी क्यूँ न…… आखिर सवाल पंद्रह वोटों का जो है ? चुनावी मैदान में मुख्य  रूप से दो प्रत्याशी आमने सामने थे , जिसमे पहला नाम दो बार से लगातार प्रधान रहे सेठ दीनानाथ और दूसरा नाम गावं का एक किसान भोला राम था।  सेठ दीनानाथ जितना ही नाम से बड़ा है  उतना ही दिल से छोटा। दिना नाथ के पास कई एकड़ जमीन , तबेला एवं गल्ले  की दुकान  है  जिसके दम पर वो अपनी राजनीती सिद्ध करता है। गावं में रहने वाले दबे - कुचले वर्गो के लोग उसकी दिहाड़ी मजदूरी करते थे , जिसके बदले में दिना नाथ उनको राशन का सामान देता था।  जहाँ एक ओर दिना नाथ किसानो से अधिक काम लेता था वहीँ राशन  देते समय वजन में चुना भी लगता था। चुनाव के दुसरे प्रत्याशी भोलाराम के पास लोगो को देने के लिए कुछ भी न था , सिवाय  उसकी इमानदारी एवं कुशल व्यवहार के।

      दोनों प्रत्यशियों ने चुनावी प्रचार के लिए जम  कर पसीने बहाये  और अपने अपने तरीको से गावं वालो को अपने पाले में लाने की कोशिश की। मतदान से ठीक  एक दिन  पहले सेठ दीनानाथ ने अपने पैसे का दम दिखाया और हर किसी को तोहफे देकर खरीदना चाहा , पर पिछले दस सालो से दीनानाथ के लूट खसोट एवं ढुलमुल रवैये से जूझ रहे गावं वाले किसी तरह दीनानाथ से छुटकारा पान चाहते थे। हालाँकि उनमे से कुछ दीनानाथ के बहकावे में आ गए पर दिना नाथ का सबसे बड़ा निशाना कन्हैया लाल का परिवार था। मतदान वाली सुबह से पहले दीनानाथ कन्हैया के घर पर पहुंचा और नोटों की कुछ बण्डल उसके हाथो में देते हुए कहा कि ' जितने के बाद तुम्हारी  बेटियों की शादी एवं लडको के  नौकरी की जिम्मेदारी मेरी '

     समय की मार एवं गरीबी से बेहाल कन्हैया को कुछ भी ना सुझा और तुरंत पैसो को जेब में रख लिया और दीनानाथ को भरोसा दिया कि उसके घर का सारा वोट दीनानाथ को जाएगा। अब सेठ पूरी तरह आश्वस्त हो गया था कि उसकी जीत पक्की है। आखिर कार मतदान  का दिन आ गया लोग भरी संख्या में मतदान किये।  मतदान के बाद सबका  ध्यान चुनाव परिणाम की तरफ था। सबके होश उड़ गए जब उन्हें पता चला कि दीनानाथ बारह मतों से विजयी हो गया। अब दीनानाथ के ख़ुशी का ठिकाना ना रहा और वो अपने जीत के जश्न में डूब गया उधर दूसरी ओर गरीब भोला नाथ के साथ - साथ गावं वालो की  भी उम्मीदों  का सूरज ढल गया।
    कुछ दिनों बाद जब गावं के लोग दीनानाथ के पास स्कूल व हैंडपंप को बनवाने को लेकर उसके किये हुए वादे की याद दिलाने पहुचे तो , दीनानाथ सब कुछ भूलते हुए आक्रामक तेवर में लोगो से कहा कि कैसा स्कूल कैसा नल ? इस चुनाव में मेरे पूरे दस हजार रुपये खर्च हुए है , जब तक मै  उन पैसो की भरपाई नहीं कर लेता गावं के विकास के बारे में सोच भी नहीं सकता। दीनानाथ की बातें सुनकर लोगो को बड़ा आघात पहुंचा , पर वो कर भी क्या सकते थे ?  गावं वालो से छुपकर कन्हैया जब दीनानाथ से अपनी बेटियों की शादी के बारे में पूछा तो दीनानाथ ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि कैसा वादा  ?  तेरे एक - एक वोट को मैंने खरीदा है जा जाकर खेतो के बाकी काम पूरा कर। ये सुनकर कनहैया  लाल अपने किये पर फफक - फफक कर रोने लगा और तब उसे एहसास हुआ कि  कैसे उसकी  एक छोटी सी नादानी उसके घर और पुरे गावं के लिए अभिशाप बन गयी।

     याद रहे कि २०१४ का आम चुनाव आने वाला है , और सेठ दीनानाथ की तरह कई प्रत्यासी हमारे सामने होंगे। " उंगली पर लगाने वाला ये छोटा सा निशान  देश के मस्तिषक पर तिलक भी लगा सकता है और कलंक भी "

1 comment:

  1. Good 1 Akhilesh...one of the imp. point to remember while voting

    ReplyDelete