महिलाओ की गलत तस्वीर बयां कर रहे डेली सोप्स ......
भारत में सैटेलाइट टीवी केआने से टेलिविजन प्रसारण का चरित्र पूरी तरह बदल दिया है। आज विभिन्न निजी चैनल अपने मुनाफे के आगे नैतिकता व सामाजिक उत्तरदायित्व को अनदेखा कर रहे है। धारावाहिक का जो पैटर्न हुआ करता था निजीकरण ने उसको पूरीतरह बदल दिया। व्यवसायवाद के इस सफ़र में आज टीवी पर समाज की असंतुलित तस्वीर दिखाई दे रही है। खासकर महिलाओं की छवि को मनमाने तरीके से तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। इनमें समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे ले जाने की कोशिश नजर आती है।
लगभग हर धारावाहिक में महिलाओ को विभिन्न प्रकार के परीक्षाओ से गुजरना पड़ता है। लड़की को बहु बनाने के लिए उन्हें तरह - तरह के उलटे सीधे टास्क दिए जाते है। कभी उनको नौकरानियों की तरह काम करवाया जाता है , कभी पति या घर वाॅलो के द्वारा उसपर किये जाने वाले अत्याचारो चुप को चुप - चाप सहने को कहा जाताहै।
अक्सर सेरिअल्स में जब कोई बेटा शराब पीकर अपनी पत्नी को गाली देता है , तथा उसको बेरहमी से पीटता है , तो माँ बाप द्वारा उसको ऐसे करने से रोकने की बात को नहीं दिखया जाता है। वही दूसरी ऒर अगर बहु से खाना बनाने में थोड़ी सी भी चुक हो जाए तो , उसपर होने वाले हंगामो को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाताहै।
छोटी सी छोटी बात पर बहु को घर से निकालने की धमकी दी जाती है , दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया जाता और इतना होने के वावजूद उसको शान्ति से सब सहने को कहाजाता है। ऐसा न करने पर न केवल उसे एक असंस्कारी बहू के रूप में दिखाया जाता है , बल्कि उसे असभ्य व झगड़ा करने वाली भी बहु बताया जाता है।
कलर्स पर आने वाले शो बानी में कुछ दिन पहले जो कांसेप्ट चल रहा था , उसे देख महिलाओ के बारे में गलत मैसेज जाता है। धारावाहिक में नायिका को एक अच्छी बहु बनने के लिए रोज नए - नए टास्क दिए जाते है , और सब कुछ सही ढंग से होने के बाद भी उसे ताने , घुड़कियाँ सुननी पड़ती है। ताने सुनकर , जुल्म सहकर भी अगर वो खुद को अच्छी बहु साबित ना कर पायी तो उसे मायके भेज देने कि धमकी दी जाती है।
ऐसे शो में ज़रा से भी ये नहीं दिखाया जाता है कि अपने ऊपर हो रहे जुल्म के खिलाफ वो आवाज उठाती है , अपने अधिकार के लिए लड़ती है तथा उसपर होने वाले अत्याचार के लिए जिम्मेदार लोगो को वो सजा दिलाती है।
समझ में नहीं आता कि ऐसी महिलाएं आज कहां हैं? और अगर हैं भी तो क्या ये चैनल उन्हें दूसरी औरतों के लिए रोल मॉडल की तरह पेश करना चाहते हैं? सीरियलों में 'सहनशील' औरतों की कहानी बार- बार दोहराई जा रही है। और आश्चर्य तो यह है कि ऐसे टीवी सीरियलों की टीआरपी भी बहुत है। तो क्या यह मान लिया जाए कि दर्शक औरत का यही रूप पसंद कर रहे हैं?
टीवी का हमारे ऊपर बहुत गहरा प्रभव होता है , ऐसे में अगर इस प्रकार के शो सबके सामने परोसा जाए तो , न इससे केवल महिलाओ कि अस्तित्व पर सवाल उठता है , बल्कि महिला शसक्तीकरण को भी आघात पहुचता है। ऐसे में धारावाहिक के निर्देशको को बस फायदे के बारे में सोच कर सेरिअल्स नहीं बनाना चाहिए। यहाँ जरुरत है समाज में महिलाओ कि स्तिथि को अच्छे से दिखया जाना चाहिए।
भारत में सैटेलाइट टीवी केआने से टेलिविजन प्रसारण का चरित्र पूरी तरह बदल दिया है। आज विभिन्न निजी चैनल अपने मुनाफे के आगे नैतिकता व सामाजिक उत्तरदायित्व को अनदेखा कर रहे है। धारावाहिक का जो पैटर्न हुआ करता था निजीकरण ने उसको पूरीतरह बदल दिया। व्यवसायवाद के इस सफ़र में आज टीवी पर समाज की असंतुलित तस्वीर दिखाई दे रही है। खासकर महिलाओं की छवि को मनमाने तरीके से तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। इनमें समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे ले जाने की कोशिश नजर आती है।
लगभग हर धारावाहिक में महिलाओ को विभिन्न प्रकार के परीक्षाओ से गुजरना पड़ता है। लड़की को बहु बनाने के लिए उन्हें तरह - तरह के उलटे सीधे टास्क दिए जाते है। कभी उनको नौकरानियों की तरह काम करवाया जाता है , कभी पति या घर वाॅलो के द्वारा उसपर किये जाने वाले अत्याचारो चुप को चुप - चाप सहने को कहा जाताहै।
अक्सर सेरिअल्स में जब कोई बेटा शराब पीकर अपनी पत्नी को गाली देता है , तथा उसको बेरहमी से पीटता है , तो माँ बाप द्वारा उसको ऐसे करने से रोकने की बात को नहीं दिखया जाता है। वही दूसरी ऒर अगर बहु से खाना बनाने में थोड़ी सी भी चुक हो जाए तो , उसपर होने वाले हंगामो को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाताहै।
छोटी सी छोटी बात पर बहु को घर से निकालने की धमकी दी जाती है , दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया जाता और इतना होने के वावजूद उसको शान्ति से सब सहने को कहाजाता है। ऐसा न करने पर न केवल उसे एक असंस्कारी बहू के रूप में दिखाया जाता है , बल्कि उसे असभ्य व झगड़ा करने वाली भी बहु बताया जाता है।
कलर्स पर आने वाले शो बानी में कुछ दिन पहले जो कांसेप्ट चल रहा था , उसे देख महिलाओ के बारे में गलत मैसेज जाता है। धारावाहिक में नायिका को एक अच्छी बहु बनने के लिए रोज नए - नए टास्क दिए जाते है , और सब कुछ सही ढंग से होने के बाद भी उसे ताने , घुड़कियाँ सुननी पड़ती है। ताने सुनकर , जुल्म सहकर भी अगर वो खुद को अच्छी बहु साबित ना कर पायी तो उसे मायके भेज देने कि धमकी दी जाती है।
ऐसे शो में ज़रा से भी ये नहीं दिखाया जाता है कि अपने ऊपर हो रहे जुल्म के खिलाफ वो आवाज उठाती है , अपने अधिकार के लिए लड़ती है तथा उसपर होने वाले अत्याचार के लिए जिम्मेदार लोगो को वो सजा दिलाती है।
समझ में नहीं आता कि ऐसी महिलाएं आज कहां हैं? और अगर हैं भी तो क्या ये चैनल उन्हें दूसरी औरतों के लिए रोल मॉडल की तरह पेश करना चाहते हैं? सीरियलों में 'सहनशील' औरतों की कहानी बार- बार दोहराई जा रही है। और आश्चर्य तो यह है कि ऐसे टीवी सीरियलों की टीआरपी भी बहुत है। तो क्या यह मान लिया जाए कि दर्शक औरत का यही रूप पसंद कर रहे हैं?
टीवी का हमारे ऊपर बहुत गहरा प्रभव होता है , ऐसे में अगर इस प्रकार के शो सबके सामने परोसा जाए तो , न इससे केवल महिलाओ कि अस्तित्व पर सवाल उठता है , बल्कि महिला शसक्तीकरण को भी आघात पहुचता है। ऐसे में धारावाहिक के निर्देशको को बस फायदे के बारे में सोच कर सेरिअल्स नहीं बनाना चाहिए। यहाँ जरुरत है समाज में महिलाओ कि स्तिथि को अच्छे से दिखया जाना चाहिए।



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