मीडिया की स्वतंत्रता व सीमा ....
स्वतन्त्रता हर किसी की पहली जरुरत होती है, जो इंसान को खुल के सोचने , बोलने व कुछ करने की आजादी देती है। स्वंत्रता के अभाव में इंसान का न केवल , शरारीरिक शोषण होता है , बल्कि मानसिक भी। जब तक इंसान खुलकर सोचने को , अपनी भवनो को व्यक्त करने को स्वतंत्र न हो उसकी आजादी हमेशा गुलामी जैसी होती है।
लोकतंत्र में जो सबसे अहंम बात है है , वो है वो है भावनाओ का व्यक्तिकरण। फिर चाहे ये कुशासन हो , अत्याचार हो या शोषण इंसान को इन सब के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। भले ही बुरा करने वाला इंसान कितना भी पहुच वाला हो , पैसे वाला हो हर, पर किसी को उसके खिलाफ स्वतंत्र रूप से बोलने की आजादी होनी चाहिए।
स्वतंत्रा कि जो सबसे बड़ी गरिमा है , वो है इसकी सीमा। इंसान को स्वतंत्रा दी गयी है पर इसके सदुपयोग के लिए न की द्रुपयोग के लिये। हम स्वतंत्र है पर वही तक , जहाँ से दूसरे कि स्वतन्त्रता शुरू होती है। हमारी स्वतंत्राता वही ख़त्म हो जाती है , जहाँ से दूसरे कि शुरू होती है।
वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र हर पहलु में इसकी विशेष भूमिका है , पर आज यहाँ हम जिस विषय पर बात कर रहे है वो है प्रेस कि स्वतन्त्रता। जी हाँ हम सब जानते है कि प्रेस कि स्वतन्त्रता से ना केवल प्रेस को बिना किसी रोक टोक के कार्य करने कि आजादी मिलती है , बल्कि समाज विकास भी होता है।
अगर हम प्रेस की शुरूआती दिनो कि बात भारत में करे तो , पाएंगे कि उस समय स्वतंत्रता जैसी कोई चीज ही नहीं हुआ करती थी। अंग्रेज मीडिया को नियंत्रण में रखने के लिए तमाम प्रकार के दमन कारी क़ानून बनाकर समय - समय पर पत्रकारो को प्रताड़ित करते रहे, और उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाते रहे।
भारत की आजादी परांत जब देश का संविधान बना तब प्रेस कि स्वतंत्रता के बारे में विचार कर इसे संवैधानिक स्वतन्त्रता दी गयी। प्रेस को जो संवैधानिक स्वतन्त्रता है , वो भारतीय संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (अ) के अंतर्गत मिली नागरिको को वाणी व अभ्व्यक्ति कि स्वतंत्रता में ही अंतर्निहित है। कहने का तात्पर्य प्रेस को कोई अलग से ताकत नहीं दी गयी है।
ये स्वतंत्रताएं इस प्रकार से समझी जा सकती है। देश का कोई भी नागरिक बोलकर , लिखकर , अभिनयकार व चित्रकारी के माध्यम से अपनी भावनाओ को व्यक्त कर सकता है। किसी भी मीडियकर्मी के लिए ये स्वतंत्रताएं रामबान जैसी होती है , जिसकी ताकत से वो अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते है।
मीडिया का जो बेसिक कार्य है वो है , सूचना देना , शिक्षित करना व मनोरंजन करना। कोई भी सूचना जिसे पाने के लिए स्वतंत्रता ना हो उसमे , सत्यता व निष्पक्षता की कमी ही नहीं बल्कि नगण्य होता है। एक मीडियाकर्मी को तमाम प्रकार के बंधन , सीमाओ से मुक्त होकर काम करने की आजादी होनी चाहिए।
मीडिया द्वारा दिखाई व बताई गयी बातो का समाज पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है , ऐसे में अगर अगर मीडिआ पर बहुत ज्यादा नियंत्रण हो तो इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ सकता है। और ऐसे में लोगो का मीडिया से विश्वास भी उठ सकता है।
कई बार ऐसे मुद्दे आते है जब मीडिया सरकार के खिलाफ आवाज उठाती है। ऐसे में अगर मीडिया को उचित स्वतन्त्रता न हो तो , एक झूठी व पक्षपात कि पत्रकारिता का प्रवाह सामाज में हो सकता है। अक्सर सरकार मीडिया क़ी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने कि कोशिश करती है , ताकि उनकी काली करतूतो का सारा चिट्ठा समाज के सामने ना आ जाए।
मीडिया की स्वतंत्रता सिर्फ इसलिए नहीं कि , वो आम जनता कि आवाज है , बल्कि इसलिए भी जरुरी है, कि वो समाज का आइना है।
ये तो हुई स्वतंत्रता कि बात पर सवतंत्रता का मतलब कुछ भी करने कि आजादी नहीं होती इसके लिए मीडिया के ऊपर कुछ युक्ति युक्त निर्वंधन भी लागाये जाते है। ये निर्वंधन प्रेस कि स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं , बल्कि प्रेस से एक आदर्श पत्रकारिता के लिये बनाये गए है। संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (अ) के अंतर्गत जहाँ प्रेस कि स्वतंत्रता दी गयी है , वही १९ ( 2 ) के अंतर्गत इसपर निर्वंधन व सीमा तय कि गयी है।
इसके अंतर्गत आठ विषय है जिसके उलंघन पर प्रेस पर उचित नियंत्रण लगाए जा सकते है। भारत कि प्रभुता व अखण्डता , विदेशी राज्यो से मैत्री पूर्ण सम्बन्ध , सार्वजनिक व्यवस्था , राज्य की सुरक्षा, शिष्टाचार व सदाचार , न्यायालय अवमाना , मानहानि व अपराध उद्दीपन। ये आठ ऐसे विषय है जिसके अंतर्गत मीडिया पर नियंत्रण रखा जा सकता है , पर ये नियंत्रण ना तो मनमाने तरीके से होगा न ही आवश्यकता से अधिक।
दोनों पहलुओ को देखने के बाद ये बात समझ में आती है , कि मीडिया कि स्वतंत्रता बहुत जरुरी है , पर उतनी ही जरुरी है दूसरे की आजादी। ऐसे में मीडिया को अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग दुसरो कि स्वतंत्रता को ध्यान में रखकर करनी चाहिए।
स्वतन्त्रता हर किसी की पहली जरुरत होती है, जो इंसान को खुल के सोचने , बोलने व कुछ करने की आजादी देती है। स्वंत्रता के अभाव में इंसान का न केवल , शरारीरिक शोषण होता है , बल्कि मानसिक भी। जब तक इंसान खुलकर सोचने को , अपनी भवनो को व्यक्त करने को स्वतंत्र न हो उसकी आजादी हमेशा गुलामी जैसी होती है।
लोकतंत्र में जो सबसे अहंम बात है है , वो है वो है भावनाओ का व्यक्तिकरण। फिर चाहे ये कुशासन हो , अत्याचार हो या शोषण इंसान को इन सब के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। भले ही बुरा करने वाला इंसान कितना भी पहुच वाला हो , पैसे वाला हो हर, पर किसी को उसके खिलाफ स्वतंत्र रूप से बोलने की आजादी होनी चाहिए।
स्वतंत्रा कि जो सबसे बड़ी गरिमा है , वो है इसकी सीमा। इंसान को स्वतंत्रा दी गयी है पर इसके सदुपयोग के लिए न की द्रुपयोग के लिये। हम स्वतंत्र है पर वही तक , जहाँ से दूसरे कि स्वतन्त्रता शुरू होती है। हमारी स्वतंत्राता वही ख़त्म हो जाती है , जहाँ से दूसरे कि शुरू होती है।
वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र हर पहलु में इसकी विशेष भूमिका है , पर आज यहाँ हम जिस विषय पर बात कर रहे है वो है प्रेस कि स्वतन्त्रता। जी हाँ हम सब जानते है कि प्रेस कि स्वतन्त्रता से ना केवल प्रेस को बिना किसी रोक टोक के कार्य करने कि आजादी मिलती है , बल्कि समाज विकास भी होता है।
अगर हम प्रेस की शुरूआती दिनो कि बात भारत में करे तो , पाएंगे कि उस समय स्वतंत्रता जैसी कोई चीज ही नहीं हुआ करती थी। अंग्रेज मीडिया को नियंत्रण में रखने के लिए तमाम प्रकार के दमन कारी क़ानून बनाकर समय - समय पर पत्रकारो को प्रताड़ित करते रहे, और उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाते रहे।
भारत की आजादी परांत जब देश का संविधान बना तब प्रेस कि स्वतंत्रता के बारे में विचार कर इसे संवैधानिक स्वतन्त्रता दी गयी। प्रेस को जो संवैधानिक स्वतन्त्रता है , वो भारतीय संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (अ) के अंतर्गत मिली नागरिको को वाणी व अभ्व्यक्ति कि स्वतंत्रता में ही अंतर्निहित है। कहने का तात्पर्य प्रेस को कोई अलग से ताकत नहीं दी गयी है।
ये स्वतंत्रताएं इस प्रकार से समझी जा सकती है। देश का कोई भी नागरिक बोलकर , लिखकर , अभिनयकार व चित्रकारी के माध्यम से अपनी भावनाओ को व्यक्त कर सकता है। किसी भी मीडियकर्मी के लिए ये स्वतंत्रताएं रामबान जैसी होती है , जिसकी ताकत से वो अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते है।
मीडिया का जो बेसिक कार्य है वो है , सूचना देना , शिक्षित करना व मनोरंजन करना। कोई भी सूचना जिसे पाने के लिए स्वतंत्रता ना हो उसमे , सत्यता व निष्पक्षता की कमी ही नहीं बल्कि नगण्य होता है। एक मीडियाकर्मी को तमाम प्रकार के बंधन , सीमाओ से मुक्त होकर काम करने की आजादी होनी चाहिए।
मीडिया द्वारा दिखाई व बताई गयी बातो का समाज पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है , ऐसे में अगर अगर मीडिआ पर बहुत ज्यादा नियंत्रण हो तो इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ सकता है। और ऐसे में लोगो का मीडिया से विश्वास भी उठ सकता है।
कई बार ऐसे मुद्दे आते है जब मीडिया सरकार के खिलाफ आवाज उठाती है। ऐसे में अगर मीडिया को उचित स्वतन्त्रता न हो तो , एक झूठी व पक्षपात कि पत्रकारिता का प्रवाह सामाज में हो सकता है। अक्सर सरकार मीडिया क़ी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने कि कोशिश करती है , ताकि उनकी काली करतूतो का सारा चिट्ठा समाज के सामने ना आ जाए।
मीडिया की स्वतंत्रता सिर्फ इसलिए नहीं कि , वो आम जनता कि आवाज है , बल्कि इसलिए भी जरुरी है, कि वो समाज का आइना है।
ये तो हुई स्वतंत्रता कि बात पर सवतंत्रता का मतलब कुछ भी करने कि आजादी नहीं होती इसके लिए मीडिया के ऊपर कुछ युक्ति युक्त निर्वंधन भी लागाये जाते है। ये निर्वंधन प्रेस कि स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं , बल्कि प्रेस से एक आदर्श पत्रकारिता के लिये बनाये गए है। संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (अ) के अंतर्गत जहाँ प्रेस कि स्वतंत्रता दी गयी है , वही १९ ( 2 ) के अंतर्गत इसपर निर्वंधन व सीमा तय कि गयी है।
इसके अंतर्गत आठ विषय है जिसके उलंघन पर प्रेस पर उचित नियंत्रण लगाए जा सकते है। भारत कि प्रभुता व अखण्डता , विदेशी राज्यो से मैत्री पूर्ण सम्बन्ध , सार्वजनिक व्यवस्था , राज्य की सुरक्षा, शिष्टाचार व सदाचार , न्यायालय अवमाना , मानहानि व अपराध उद्दीपन। ये आठ ऐसे विषय है जिसके अंतर्गत मीडिया पर नियंत्रण रखा जा सकता है , पर ये नियंत्रण ना तो मनमाने तरीके से होगा न ही आवश्यकता से अधिक।
दोनों पहलुओ को देखने के बाद ये बात समझ में आती है , कि मीडिया कि स्वतंत्रता बहुत जरुरी है , पर उतनी ही जरुरी है दूसरे की आजादी। ऐसे में मीडिया को अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग दुसरो कि स्वतंत्रता को ध्यान में रखकर करनी चाहिए।



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