हॉस्पिटल या बीमारी घर ?
हॉस्पिटल जहाँ हम अपनी बीमारियों के निदान के लिए जाते है , जहाँ से हमें किसी भी प्रकार के रोग एवं तालीफ़ से निजात मिलती है। पर आप ने कभी सोचा है कि ऐसे कई हॉस्पिटल जो बीमारियाँ एवं घटक रोग फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं। जी हाँ हम बात कर रहे है उन सरकारी होस्पितालो की जहाँ लोग रोग से निजात के लिए जाते हैं , पर उनके साथ या कभी - कभी वो खुद किसी दुसरे बीमारी का शिकार बन जाते हैं।
मुंबई के मुलुंड एरिया में एक सरकारी हॉस्पिटल है जहाँ कुछ दिन पहले मैं अंकल को लेकर गया था। दरसल मेरे अंकल को मलेरिया की शिकायत थी। हॉस्पिटल के डॉक्टर ने उन्हें एडमिट करे की सलाह दी। जिस वार्ड में उन्हें रखा गया उस वार्ड में पहले से ही कई और मलेरिया के रोगी थे। वार्ड की हालत देख राम गोपाल वर्मा की हॉरर फिल्म का सीन याद आ रहा था। सीलिंग पर लगा चुन जगह - जगह से छोड़कर गिर रहा था , वार्ड में पंखे तो थे पर उनकी रफ़्तार को आराम से गिना जा सकता था। लगभग हर बेड के पीछे खिड़की थी पर सुरक्षा के नाम पर उन खिडकियों में सिर्फ टूटे कांच थे।
खैर ये तो हो गयी हॉस्पिटल की सुन्दरता की बाते पर जो असल मुद्दा है वो इससे कहीं और आगे है. मेरे अंकल को चार दिन तक वहां रखा गया था। उन्हें मलेरिया से तो राहत मिल गयी पर वार्ड में दबंगई से घुमाने वाले बड़े - बड़े मछरो के अटैक से उन्हें डेंगू हो गया साथ ही उनके देख रेख के लिए हॉस्पिटल में रहने गयीं मेरी आंटी को भी मलेरिया हो गया।
अंकल के बाजू वाले खाट पर एक वृद्ध था जो पूरी तरह उठाने - बैठने में असमर्थ था नतीजन वो बीएड पर ही शौच करने को मजबूर था। उस वृद्ध के बीएड पर फैले मल - मूत्र से सारा वार्ड बदबू कर रहा था , पर किसी भी वार्ड बॉय की न उनपे नजर पड़ती न ही वो वार्ड की इस दुर्गन्ध से परिचित हो पाते। हॉस्पिटल में बने शौचालय की हालत देख मई घबरा गया और जल्दी से बाहर निकल आया। शौचालय में इतनी गन्दगी थी कि कोई एक सेकंड भी वहां खडा ना हो पाए , पर वार्ड के सारे मरीज उसी सौचालय में जाने को मजबूर थे।
अब जरा सोचिये किसी भी हॉस्पिटल की हालत इस तरह होगी तो वहां क्या होगा ? और वहां के मरीजो का हालत क्या होगा ? निश्चय ही ऐसे वातावरण में अगर किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को भी जानापड़े तो वो बीमार हो जाएगा। सरकार द्वारा सीधे तौर पर संचालित होने वाले इन हॉस्पिटलो में ऐसी लापरवाही एवं दैनीय स्थिति क्यों बनी है ?
हॉस्पिटल जहाँ हम अपनी बीमारियों के निदान के लिए जाते है , जहाँ से हमें किसी भी प्रकार के रोग एवं तालीफ़ से निजात मिलती है। पर आप ने कभी सोचा है कि ऐसे कई हॉस्पिटल जो बीमारियाँ एवं घटक रोग फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं। जी हाँ हम बात कर रहे है उन सरकारी होस्पितालो की जहाँ लोग रोग से निजात के लिए जाते हैं , पर उनके साथ या कभी - कभी वो खुद किसी दुसरे बीमारी का शिकार बन जाते हैं।
मुंबई के मुलुंड एरिया में एक सरकारी हॉस्पिटल है जहाँ कुछ दिन पहले मैं अंकल को लेकर गया था। दरसल मेरे अंकल को मलेरिया की शिकायत थी। हॉस्पिटल के डॉक्टर ने उन्हें एडमिट करे की सलाह दी। जिस वार्ड में उन्हें रखा गया उस वार्ड में पहले से ही कई और मलेरिया के रोगी थे। वार्ड की हालत देख राम गोपाल वर्मा की हॉरर फिल्म का सीन याद आ रहा था। सीलिंग पर लगा चुन जगह - जगह से छोड़कर गिर रहा था , वार्ड में पंखे तो थे पर उनकी रफ़्तार को आराम से गिना जा सकता था। लगभग हर बेड के पीछे खिड़की थी पर सुरक्षा के नाम पर उन खिडकियों में सिर्फ टूटे कांच थे।
खैर ये तो हो गयी हॉस्पिटल की सुन्दरता की बाते पर जो असल मुद्दा है वो इससे कहीं और आगे है. मेरे अंकल को चार दिन तक वहां रखा गया था। उन्हें मलेरिया से तो राहत मिल गयी पर वार्ड में दबंगई से घुमाने वाले बड़े - बड़े मछरो के अटैक से उन्हें डेंगू हो गया साथ ही उनके देख रेख के लिए हॉस्पिटल में रहने गयीं मेरी आंटी को भी मलेरिया हो गया।
अंकल के बाजू वाले खाट पर एक वृद्ध था जो पूरी तरह उठाने - बैठने में असमर्थ था नतीजन वो बीएड पर ही शौच करने को मजबूर था। उस वृद्ध के बीएड पर फैले मल - मूत्र से सारा वार्ड बदबू कर रहा था , पर किसी भी वार्ड बॉय की न उनपे नजर पड़ती न ही वो वार्ड की इस दुर्गन्ध से परिचित हो पाते। हॉस्पिटल में बने शौचालय की हालत देख मई घबरा गया और जल्दी से बाहर निकल आया। शौचालय में इतनी गन्दगी थी कि कोई एक सेकंड भी वहां खडा ना हो पाए , पर वार्ड के सारे मरीज उसी सौचालय में जाने को मजबूर थे।
अब जरा सोचिये किसी भी हॉस्पिटल की हालत इस तरह होगी तो वहां क्या होगा ? और वहां के मरीजो का हालत क्या होगा ? निश्चय ही ऐसे वातावरण में अगर किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को भी जानापड़े तो वो बीमार हो जाएगा। सरकार द्वारा सीधे तौर पर संचालित होने वाले इन हॉस्पिटलो में ऐसी लापरवाही एवं दैनीय स्थिति क्यों बनी है ?
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