Friday, 7 February 2014

                                             रियलिटी शोज की रियलिटी .......





बदलते जवाने के साथ टीवी के सेरिअल्स भी बदल रहे है, जहाँ कभी टीवी पर  सिर्फ  पारिवारिक ड्रामा ही पसंद किया जाता था आज वहा रियलिटी शो  का  बोल बाला है।  बढ़ते रियलिटी शो और दर्शको की इसके प्रति बढ़ाते  रुझान को  देख लगता है , कि  आज अधिक से अधिक लोग टीवी रियलिटी शो के लिए ही देख रहे है।

टीवी और रियलिटी शो आजकल एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। ऐसा कोई भी टीवी चैनल नहीं है जिसमें कोई न कोई रियलिटी शो न आ रहा हो। मुद्दा यह है कि रियलिटी शोज़ के नाम पर सच दिखाने वाले इन कार्यक्रमों में असल में कितना सच और कितना झूठ (बुना हुआ) शामिल रहता है यह किसी को भी पता नहीं।  अक्सर ऐसा होता है जब रियलिटी शोज में कोई कंटेस्टेंट बाहर होता है , तो उसके साथ मानो सबके आँखों  आंसू बहने लगते है।  कभी - कभी को तो चीजो को  ऐसे पोर्ट्रेट किया जाता है  , कि देखने वाले ये भूल जाते है , कि ये टीवी है।  अपने शो कि टी आर पी बढ़ने केलिये चैनल वाले ऐसे भावनात्मक चीजो को दिखा कर ऑडियंस को अपनी और बांधे रहते है।



अधिकांश दर्शक इनके भावनात्मक ड्रामे और सनसनीखेज रोमांच की पकड़ में आ ही जाते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या वाकई दर्शक इतने बुद्धिहीन हैं कि वे रियलिटी शो के सच और झूठ को समझ नहीं पाते?   इस बात को जानने के लिए मैं  अपने क्षेत्र के कुछ ऐसे युवाओ से मिला जो निरंतर रियलिटी शोज देखते है।  तो आइये जानते है क्या सोचते है आज के युवा ऐसे रियलिटी शोज पर  ?
ग्रेजुएशन की छात्रा अमीना से जब मैंने इस बारे में पूछा तो उनका कहना था , कि रियलिटी शोज वास्तव में रियल्टी बेस्ड होता है , क्योकि वो ऐसे - ऐसे लोगो को प्लेटफार्म देते है जो कभी उसके बारे में सोचा भी नहीं होता है।


आईटी के क्षेत्र में काम करने वाली दिव्या सामड़ कहती हैं- 'आज जितने भी रियलिटी शो दिखाए जा रहे हैं उनके पीछे शुद्ध व्यावसायिकता छुपी हुई है। हर चैनल वाले अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए रियलिटी शोज में ऐसे  भावनात्मक ड्रामे करवाते रहते है।  बात सिर्फ भावनात्मक ड्रामे की ही नहीं बल्कि कई बार तो वो रियलिटी  शोज के  नाम पर समाज के सामने हिंसा , अपराध जैसी चीजो को परोसते है।  उदाहरणार्थ बिग बॉस को ही ले लीजिये।

 बी एम्  एम् कि छात्रा मनीषा राय  कहती है ,  अधिकांश लोग रियलिटी शो इसलिए देखते हैं कि इनमें उन्हें सामान्य, एकरसता वाले सीरियल्स से हटकर कुछ देखने को मिल जाता है। ऐसा नहीं है कि रियालिटी शो अच्छे या सच्चे नहीं हो सकते लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इनमें से व्यावसायिकता को हटाना पड़ेगा, जो संभव नहीं है। हालाँकि मेरा यह भी मानना है कि कुछ रियलिटी शो प्रतिभाओं को मंच भी उपलब्ध करवाते हैं लेकिन फिर वही व्यावसायिकता आड़े आ जाती है और असल उद्देश्य कहीं खो जाता है।'



'देखा जाए तो साठ प्रतिशत से भी ज्यादा झूठ ही रियलिटी शो की बुनियाद होता है। कई बार तो आम दर्शक इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते कि जो वो देख रहे हैं असल में वैसा कुछ है ही नहीं। फिर इसे भी रोमांच तथा सनसनी का तड़का लगाकर दिखाया जाता है। कुछ मिलाकर मामला पैसे कमाने का ही होता है।' -कहते है ग्राफ़िक्स डिज़ाइनर धीरज पाण्डेय।

पूजा मानती हैं कि वर्तमान में दिखाए जा रहे कई रियलिटी शोज का नकारात्मक असर समाज पर पड़ रहा है। खासतौर पर बच्चे इससे बहुत बुरी तरह प्रभावित हैं। गाने और डांस के कई रियलिटी शो ऐसे हैं जो बच्चों के नाम पर भावनाओं, रोमांच और दिखावे का ताना-बाना बुनते हैं और बच्चों को इस्तेमाल करते हैं।

 युवाओ की पतिक्रिया से जो एक बात साफ़ है वो है लाभार्जन का।  आज टीवी सिर्फ लाभ कमाने का एकमजबूत माध्यम है , और ये लाभ कमाने के रियलिटी शोज के प्रोदूसर्स एंड डिरेक्टर्स  ऑडियंस के भावनाओ संघ खेलते है।  साथ ही रियलिटी शोज के नाम पर  कभी झूठ कभी फरेब तो कभी  अपराध जैसी चीजो  को दर्शको के सामने  रखते  है।

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