Wednesday, 25 September 2013

                                                 संसद के सन्नाटे की कहानी   




संसद भवन,  जहाँ सरकार  के नीति नियंता देश में विकाश  से सम्बंधित नीतियों को कानूनी जमा पहनने को प्रस्तुत करते है।  संसद भवन में प्रस्तुत बिधेयक दोनों सदनों (लोक सभा , राज्य सभा ) में बहस के बाद राष्ट्रपति के यहाँ हस्ताक्षर के लिए जाता है , तथा राष्ट्रपति के सहमती के बाद वो कानून बन जाता है। संसद भवन में प्रस्तुत होने वाले नेतागण जितने महत्वपूर्ण होते है उससे भी महत्वपूर्ण होता है संसद का समय , पर बिडम्बना यह है की संसद के कार्यवाही में अक्सर व्यवधान उत्पन्न होता है।
        पिछले  दो वर्षो  के दौरान अक्सर संसद की कार्यवाही पूरी तरह से ठप रही।  कार्यवाही के ठप  होने का ठीकरा अक्सर पक्ष विपक्ष एक दुसरे पर फोड़ते रहे है।  देश में सत्तारूढ़ यू पी ए २ संसद भवन की कार्यवाही में अवरोध उत्पन्न  होने का पूरा जिम्मा विपक्षी  दल पर थोपती है।  यू पी ए  २ का कहना है की भाजपा किसी भी तरह संसद की कार्यवाही को सकुशल चलने नहीं देती। पर अगर हम ध्यान से सोचे तो संसद की कार्यवाही ठप करने में सिर्फ विपक्ष जिम्मेदार नहीं है , बल्कि सड़क पर हो रहे आन्दोलन एवं सरकर  के अपने साथी भी जिम्मेदार है। इस बात का अंदाजा अन्ना  हजारे  एवं केजरीवाल के जन आन्दोलन एवं रेलवे किराया बढ़ने पर तृणमूल का सरकार  से समर्थन वापस लेने से पता चलता है।  साथ ही हम एफ डी  आई एवं प्रमोशन में आरक्षण सम्बंधित विषयों पर ध्यान दे तो संसद में सभी दलों  की आम सहमती न बनाने के कारण  भी संसद की कार्यवाही ठप रही। संसद  के सदनों में हो रहे इस प्रकार के व्यवधान से जहा एक ऒर कई महत्वपूर्ण विधेयक पास होने से वंचित रह जाते है , वही दूसरी ऒर संसद पर खर्च होने वाला धन भी व्यर्थ जाता है।
              संसद के  कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न होने से सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है  क्योकि सदन की कार्यवाही जनता के विकास  एवं  जनता द्वारा दिए 'कर ' से चलती है।  अतः सरकार को अपनी जनता एवं उनके हित को ध्यान में रखकर ऐसे व्यवधानों को ख़त्म करने की रह तलाशनी चहिये.    

Saturday, 14 September 2013

                                            Social media unsocial activity 

                                                                 
सूचना क्रांति ने पुरे  विश्व  एक गावं में बदल दिया है। सूचना तंत्र के इस जाल ने खासकर इन्टरनेट हमारे जीने के तरीको में मनो एक नयी क्रांति ला दी हो। देश दुनिया में हो रहे परिवर्तन या नए आयामों से हम इन्टरनेट के माध्यम से रूबरू होते है। इन्टरनेट आधारित सोशल नेटवर्किंग साइट्स ( फेसबुक ट्विटर गूगल ) जहा हमें अपनो से दूर लोगो के साथ इंटरेक्शन करने का मौका देती है , वही आम इन्सान को सहभागी होने का अवसर भी देती है ।  सोशल नेटवर्किंग साइट्स अन्य जन माध्यमो के तुलना में कही ज्यादा ही प्रभावशाली है ,……. हो  भी न क्यों आखिर बात सहभागिता की जो है ?
         वर्तमान में  किसी भी लोकतान्त्रिक देश में आम आदमी का जो सबसे अहम् एवं प्रभावशाली हथियार है वो है सोशल नेटवर्किंग साइट्स।  पर आज हम इस हथियार को किस रूप में प्रयोग कर रहे है यह एक बड़ा प्रश्न है।  वास्तव में क्या हम ऐसे साइट्स को सोशल तरीके से प्रयोग कर रहे है ? संभवतः अगर इस पर सर्वे करे तो पाएंगे की अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अनसोशल हरकत करते है।  वाणी एवं अभिव्यक्ति के नाम पर लोग अक्सर मनमानी करते है।  इसका उदहारण ऐसे साइट्स पर देखे जा सकते है।  समाज में बढ़ रहे अपराध , भ्रष्टाचार, महंगाई  इत्यादि ऐसे कई सामाजिक समस्याएँ है जिसके लिए हम सरकार को जिम्मेवार ठहराते है और कड़ी आलोचना करते है।  पर जिस तरह से हम रोष व्यक्त करते है क्या वो एक सोशल समाज को सोभा देती है ? देश के राजनेताओ के आपत्ति जनक फोटो एवं विडियो जिस तरह इन साइट्स पर देखे जाते है , उससे न केवल उनके सम्मान पर आंच आती है , वल्कि हमारे देश की छवि  भी अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर  धूमिल होती है।  गाली - गलौज , अश्लीलता , हिन्स्सा इत्यादि ऐसे अनेक असामाजिक हरकत दिन प्रतिदिन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बढ़ रहें है , जो समाज के लिए चुनौती बनती जा रही। 
       समय रहते ही हमें ऐसी समस्याओ पर ध्यान देना होगा और ऐसे अनैतिक कार्यो पर रोक लगाने के तरीके इजाद करने होंगे साथ ही अपने कार्यप्रणाली  में भी बदलाव लाना होगा।  

Wednesday, 11 September 2013

                                              सीरीयल्स  की   सिली कहानी

 सीरियल्स हमेशा से हमारे मनोरंजन करने का एक अच्छा  माध्यम रहा है।  दिन भर की थकन ,तनाव  के  बाद जब हम घर  आते है तो टेलीविज़न देख कर खुद का मनोरंजन करते है।  घर में काम करने वाली महिलाओ के लिए तो टेलीविज़न एक वरदान जैसा है उनके अकेलेपन , एवं मानसिक शारीरिक थकावट जैसी तमाम समस्याओ का सिर्फ एक समाधान है सीरियल्स।  आज अगर टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल्स की बात करे तो ,उनकी एक अलग ही कहानी हो गयी है।  भले ही विभिन्न चैनलो पर विभिन्न नामो से सीरियल्स आते है , पर अगर धयान से सोचे तो उन सब की कहानी एक जैसी चलती है।  वर्तमान में टीवी सीरियल्स पर जो एक नयी हवा चली है वो है "पुनर्विवाह  "  मेरा मकसद पुनर्विवाह का बिरोध करना नहीं है , बल्कि हर चैनल पर दिखाई जा रही इस कहानी से लोगो को रूबरू करना है।   आज किस तरह से हर चैनल इस कांसेप्ट को अपनी कहानी का हिस्सा बना रही है, किस तरह दूसरी तीसरी शादियों का किस्सा हर सीरियल्स में आ रहा है इसका उदाहरण स्टार प्लस ,जी टीवी , कलर्स एवं सोनी पर धिकाए जा रहे धारावाहिकों से पता चलता है।  अगर बात हम स्टार प्लस की करे तो इस पर दिखाए जाने वाला  फेमस धारावाहिक प्रतिज्ञा में कोमल की एवं  शक्ति की दुबारा शादी होती है , वही धारावाहिक में मुख्य किरदार में रहे सज्जन सिंह की भी दो शादियाँ दिखाई गयी थी।  जी  टीवी प्रसारित होने वाली पुनर्विवाह की  तो कहानी ही दूसरी विवाह का था।  अब जब दो लीडिंग चैनल्स पुनर्विवाह जैसे कहानी  को अपने धारावाहिक  का हिस्सा बना रहे है तो कलर्स कैसे पीछे रह सकता है।   कलर्स के धारावाहिक उतरन की बात करे तो "इच्छा"  की शादी पहले "वंश"  से होती है तथा दूसरी शादी वीर से होती है।  उतरन के एक दूसरी पात्र "तपस्या"  की पहली शादी वीर से वही दूसरी शादी राठौर से होती है।  इस धारावाहिक में पुनर्विवाह की कहानी यही नहीं थमती मनो ये इस सीरियल की परंपरा बनती जा रही है उतरन में ही इच्छा की बेटी मीठी की भी पहली शादी आकाश से होती है और दूसरी विष्णु से होती है।  कलर्स के ही एक अन्य सीरियल "ना  बोले तुम न मैंने कुछ कहा" की भी कहानी दूसरी शादी के ही  इर्द गिर्द घुमती है इस धारावाहिक में मेघ की पहली शादी अमर ब्यास से होती है तथा दूसरी मोहन भटनागर से होती है।  कलर्स चैनल की टी आर पी बढ़ने वाली धारावाहिक "वालिका बधू " की भी  कहानी यही सब बयां करती है, "ससुराल सिमर" का नमक धारावाहिक भी इसी प्रकार की स्टोरी से आगे बढ़ रही है
   अब जो मुख्य बात है , वो है कि  क्या ऐसे धारावाहिकों के स्क्रिप्ट पहले से ही ऐसी लिखी जाती है या सिर्फ टी आर पी के लिए ये सब होता है ?

Thursday, 29 August 2013

                                रुपये  की हालत नाजुक, आई सी यू में भर्ती 


रुपये के बिगड़ते स्वास्थ्य ने पूरे देश को चिंता में डाल  दिया है। बुधवार की रात अचानक रुपये के रक्त चाप में आये कमी ने देश की रफ़्तार कम कर दी।  रक्तचाप में लगातार कमी को देखते हुए उसे यू पी ए २ के आई सी यू में भर्ती  किया गया है।
      अभी कुछ दिन पहले ही रुपये ने अपना ६७ वां जन्मदिवस बड़ी धूम- धाम से मनाया  था।  हालाँकि रुपये का स्वास्थ्य पिछले  एक साल से लगातार गिर रहा था, पर बुधवार की रात स्तिथि कुछ ज्यादे ही नाजुक हो गयी।  यू पी ए २ हास्पिटल में रुपये का इलाज कर रहे डॉक्टर मनमोहन  सिंह एवं  उनके सहयोगी सर्जन पी चिदंबरम ने बताया कि हम  रुपये के हालत में सुधार  लाने की  हर संभव कोशिश में लगे है जल्द ही रुपये का गिरता स्वास्थ्य हमारे काबू में होग।   डाक्टारो ने बताया कि हम रुपये के स्वास्थ्य  में बेहतर सुधर के लिए "फारेन पालिसी ब्लड" चढ़ा रहे है साथ ही "एफ ड़ी आई इंजेक्शन" भी दे रहे है , जिससे जल्द ही रुपये के स्वास्थ्य  में रिकवरी होगी।  आप को बता दे की डाक्टारो की एक कुशल टीम अपने सीनियर डॉक्टर एवं हॉस्पिटल की मालकिन डॉ सोनिया गाँधी के मार्ग दर्शन में रुपये का इलाज कर रहे है।   यू पी ए २ हॉस्पिटल के बहार रुपये का हाल जानने के लिए लम्बी क़तर लगी है।
    देश के ही एक दुसरे बड़े हॉस्पिटल 'भाजपा' का मानना है कि  रुपये के गिरते स्वास्थ्य  का कारण उसे भ्रष्टाचार और घूसखोरी जैसे प्रदूषित वातावरण में ले जाने से हुआ है।  भाजपा हॉस्पिटल ने  यू पी ए  २ हॉस्पिटल पर निशाना साधते हुए कहा की वहां के के ही कई कर्मचारियों एवं बड़े डॉक्टरो ने ही  ये दूषित वातावरण बनाया है , जिसके कारण रुपये का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिर रहा है।  ऐसे में रुपये का स्वास्थ्य वहां ठीक होना पत्थर पर घास उगने जैसा है, साथ ही भाजपा हॉस्पिटल ने  यूपीए २ हॉस्पिटल को अयोग्य ठहराते हुए आरोप लगाया कि वहां के डॉक्टरो को पता ही नहीं है , कि  मरीज का इलाज कैसे किया जाये , भाजपा हॉस्पिटल का ये भी मानना है की रुपये की इतनी बुरी हालत नाजुक समय में एफ ड़ी आई इंजेक्शन  लगाने से हुआ है।  भाजपा हॉस्पिटल के सरे आरोपों को कांग्रेस ने सीरे से ख़ारिज करते हुए भाजपा को १९९१ का दौर याद करने को कहा। यूपीए २ के  वरिष्ठ डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा की १९९१ में भी रुपये की हालत इसी तरह लड़खड़ाई थी जब हमने अपने सफल आपरेशन से रुपये को स्वास्थ्य किया था , और हमारे इस आपरेशन की प्रसंशा देश के ही नहीं वरन विदेशो के भी बड़े डॉक्टरो ने की थी।
         खैर ये दो विरोधी हॉस्पिटलो एवं डॉक्टरो की नोक झोंक तो लगी रहेगी। आइये हम सब मिलकर भगवान् से रुपये के अच्छे  स्वास्थय की कमाना करें कि जल्द ही हमारा रूपया स्वास्थय होकर एक बार फिर  से दौड़े। 

Monday, 26 August 2013



                                स्मार्ट फोन्स  की दौड़ में सैमसंग ने मारी बाजी

भारत में स्मार्ट फ़ोन्स की दौड़ में बाकि ब्रांड्स को पीछे छोड़ते हुए सैमसंग ने मरी बजी ,२०१३ में सबसे अधिक बिक्री कर टॉप पर रही , वही नोकिया  दुसरे  माईक्रोमैक्स   तीसरे एवं एप्पल चौथे स्थान  पर रही।
             कोरियन इलेक्ट्रॉनिक  क्षेत्र की प्रमुख कम्पनी सैमसंग अपने बेहतरीन फीचर्स एवं आकर्षक लुक से हर उम्र के लोगो की पहली पसंद बन गयी है ,भारत में मोबाइल कंपनियों के बिक्री से सम्बंधित सर्वेक्षण करने वाली संस्था "वाईस एंड डेटा " ने अपने सर्वेक्षण २०१३ में भारत में ब्यापार करने वाली तीस प्रमुख मोबाइल कंपनियों को शामिल किया था।  सर्वेक्षण में ११३२८ करोड़ के ब्यापार के साथ सैमसंग पहले पायदान पर , ९७८० करोड़ के साथ नोकिया दुसरे ,३१३८ करोड़ रूपये के साथ माईक्रो मैक्स तीसरे तथा १२९३ करोड़ के साथ विश्व की चर्चित कंपनी एप्पल चौथे स्थान पर रही। इसके साथ ही देश का  मोबाइल हैंडसेट बाजार १४.७ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ ३५९४६ करोड़ रुपये पर जा पंहुचा ,जो कि २०११ - २०१२ में ३१३३० करोड़ रुपये पर था।
कम दाम में खास - सैमसंग ग्राहकों का मानना है क़ि सैमसंग अन्य कंपनियों की तुलना में कम पैसे में अधिक फीचर्स एवं बड़ी स्क्रीन देती है , ये सभी श्रेणियों के जरुरत को पूरा करती है साथ ही लम्बे समय से  इस पर हमारा विश्वास बना है।
नोकिया को झटका - सर्वेक्षण में नोकिया को झटका लगा है , पिछले कई सालो से पहले पायदान पर बरक़रार रही नोकिया एक पायदान लुढ़क कर दुसरे पायदान पर आ गयी है।  स्मार्ट फोन्स के मामले में नोकिया  लुमिया साल २०१३ में अच्छा ब्यापार करने में सफल रही है।

Sunday, 25 August 2013

                            सरकार  की उदासीनता का नतीजा है मुंबई "सामूहिक दुष्कर्म "


 पुलिस प्रशाशन के ढीले व उदासीन रबैये  का नतीजा एक बार फिर महिलाओ को भुगतना पड़ा।
देश के सबसे सुरक्षित प्रदेश मुंबई में गुरुवार की रात महिला फोटो पत्रकार के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म ने फिर से देश को सदमे में दाल दिया है।
       आज से आठ महीने पहले दिल्ली में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुराचार को प्रशासन  थोड़ी  भी गंभीरता से लेता तो आज फिर देश को हिल देने वाली वारदात की पुनरावृत्ति नहीं होती। कहने को तो मुंबई जैसे हाई टेक शहरों में सुरक्षा के पुखते इंतजाम होते है पर नाम मात्र की इंन सुरक्षाओ की पोल तब खुलती है जब कोई बड़ी घटना  होती  है।। महिला अत्याचार मुंबई में नित दिन बढ़ रहा है और प्रशासन इस पर अंकुश लगाने में असमर्थ दिख रही है। आये दिन यहाँ की लोकल ट्रेनों में महिलाओ संग छेड़ छाड़   एवं लूट पात की घटनाये होती रहती है अगर इन छोटी मोटी घटनाओ को प्रशासन गंभीरता से  ले तो निश्चय ही बड़े स्तर पर होने वाले अपराधो पर रोक लगायी जा सकती है। ऐसे घटनाओ से सम्बंधित प्रशासन की उदासीनता का तब पता चलता है , जब घटनाओ की गहन जाँच होती है। अक्सर वारदात के समय डयूटी पर तैनात सुरक्षा कर्मी या तो सो रहे  होते है या  नदारद होते है।  प्रशासन की  ऐसी लापरवाही के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद होते है , जिसका दुस्परिरम आम लोगो को भुगतना पड़ता है।
  आज हमारे देश के सामने सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा की है फिर चाहे आन्तरिक हो या बाह्य हम अक्सर इन समस्याओ से जुझते है।  बेहतर होगा सरकार इस पर गौर करे और समय रहते अपने कार्य करने के तरीको में बदलाव लाकर आम जन को सुरक्षित एवं बेख़ौफ़ जीवन जीने का विश्वास दे।