संसद के सन्नाटे की कहानी
संसद भवन, जहाँ सरकार के नीति नियंता देश में विकाश से सम्बंधित नीतियों को कानूनी जमा पहनने को प्रस्तुत करते है। संसद भवन में प्रस्तुत बिधेयक दोनों सदनों (लोक सभा , राज्य सभा ) में बहस के बाद राष्ट्रपति के यहाँ हस्ताक्षर के लिए जाता है , तथा राष्ट्रपति के सहमती के बाद वो कानून बन जाता है। संसद भवन में प्रस्तुत होने वाले नेतागण जितने महत्वपूर्ण होते है उससे भी महत्वपूर्ण होता है संसद का समय , पर बिडम्बना यह है की संसद के कार्यवाही में अक्सर व्यवधान उत्पन्न होता है।
पिछले दो वर्षो के दौरान अक्सर संसद की कार्यवाही पूरी तरह से ठप रही। कार्यवाही के ठप होने का ठीकरा अक्सर पक्ष विपक्ष एक दुसरे पर फोड़ते रहे है। देश में सत्तारूढ़ यू पी ए २ संसद भवन की कार्यवाही में अवरोध उत्पन्न होने का पूरा जिम्मा विपक्षी दल पर थोपती है। यू पी ए २ का कहना है की भाजपा किसी भी तरह संसद की कार्यवाही को सकुशल चलने नहीं देती। पर अगर हम ध्यान से सोचे तो संसद की कार्यवाही ठप करने में सिर्फ विपक्ष जिम्मेदार नहीं है , बल्कि सड़क पर हो रहे आन्दोलन एवं सरकर के अपने साथी भी जिम्मेदार है। इस बात का अंदाजा अन्ना हजारे एवं केजरीवाल के जन आन्दोलन एवं रेलवे किराया बढ़ने पर तृणमूल का सरकार से समर्थन वापस लेने से पता चलता है। साथ ही हम एफ डी आई एवं प्रमोशन में आरक्षण सम्बंधित विषयों पर ध्यान दे तो संसद में सभी दलों की आम सहमती न बनाने के कारण भी संसद की कार्यवाही ठप रही। संसद के सदनों में हो रहे इस प्रकार के व्यवधान से जहा एक ऒर कई महत्वपूर्ण विधेयक पास होने से वंचित रह जाते है , वही दूसरी ऒर संसद पर खर्च होने वाला धन भी व्यर्थ जाता है।
संसद के कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न होने से सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है क्योकि सदन की कार्यवाही जनता के विकास एवं जनता द्वारा दिए 'कर ' से चलती है। अतः सरकार को अपनी जनता एवं उनके हित को ध्यान में रखकर ऐसे व्यवधानों को ख़त्म करने की रह तलाशनी चहिये.
संसद भवन, जहाँ सरकार के नीति नियंता देश में विकाश से सम्बंधित नीतियों को कानूनी जमा पहनने को प्रस्तुत करते है। संसद भवन में प्रस्तुत बिधेयक दोनों सदनों (लोक सभा , राज्य सभा ) में बहस के बाद राष्ट्रपति के यहाँ हस्ताक्षर के लिए जाता है , तथा राष्ट्रपति के सहमती के बाद वो कानून बन जाता है। संसद भवन में प्रस्तुत होने वाले नेतागण जितने महत्वपूर्ण होते है उससे भी महत्वपूर्ण होता है संसद का समय , पर बिडम्बना यह है की संसद के कार्यवाही में अक्सर व्यवधान उत्पन्न होता है।
पिछले दो वर्षो के दौरान अक्सर संसद की कार्यवाही पूरी तरह से ठप रही। कार्यवाही के ठप होने का ठीकरा अक्सर पक्ष विपक्ष एक दुसरे पर फोड़ते रहे है। देश में सत्तारूढ़ यू पी ए २ संसद भवन की कार्यवाही में अवरोध उत्पन्न होने का पूरा जिम्मा विपक्षी दल पर थोपती है। यू पी ए २ का कहना है की भाजपा किसी भी तरह संसद की कार्यवाही को सकुशल चलने नहीं देती। पर अगर हम ध्यान से सोचे तो संसद की कार्यवाही ठप करने में सिर्फ विपक्ष जिम्मेदार नहीं है , बल्कि सड़क पर हो रहे आन्दोलन एवं सरकर के अपने साथी भी जिम्मेदार है। इस बात का अंदाजा अन्ना हजारे एवं केजरीवाल के जन आन्दोलन एवं रेलवे किराया बढ़ने पर तृणमूल का सरकार से समर्थन वापस लेने से पता चलता है। साथ ही हम एफ डी आई एवं प्रमोशन में आरक्षण सम्बंधित विषयों पर ध्यान दे तो संसद में सभी दलों की आम सहमती न बनाने के कारण भी संसद की कार्यवाही ठप रही। संसद के सदनों में हो रहे इस प्रकार के व्यवधान से जहा एक ऒर कई महत्वपूर्ण विधेयक पास होने से वंचित रह जाते है , वही दूसरी ऒर संसद पर खर्च होने वाला धन भी व्यर्थ जाता है।
संसद के कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न होने से सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है क्योकि सदन की कार्यवाही जनता के विकास एवं जनता द्वारा दिए 'कर ' से चलती है। अतः सरकार को अपनी जनता एवं उनके हित को ध्यान में रखकर ऐसे व्यवधानों को ख़त्म करने की रह तलाशनी चहिये.



