Tuesday, 11 February 2014

                                              मोबाइल टीवी का बढता क्रेज .....



कहते है परिवर्तन प्रकृति का नियम होता है , और बदलाव ही नयापन पन है।  बदलते वक़्त के साथ लोगो के लाइफ स्टाइल पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है।  हर कोई समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने को आतुर रहता है।  अब देखिये ना जब टीवी का आविष्कार हुआ तो लोगो को सेरियल्स देखने का सिर्फ यही एक माध्याम  हुआ करता था , पर बदलते वक़्त के साथ आज लोग इसके विकल्प पर कुछ ज्यादा निर्भर हो गए है।

आज टीवी देखने के लिए हमें बड़े टीवी बॉक्स की नहीं , बल्कि एक छोटे से मोबाइल की जरुरत होती है।  मोबाइल के अलावा आज हमारे पास कंप्यूटर, लैपटॉप , , टैब ऐसे कई विकल्प है जिस पर हम अपने पसंदीदा सेरिअल्स देख सकते है।  
२०१० में आये स्मार्ट फोन्स ने तो मनो घर पर बैठ के टीवी देखने की परम्परा को ही बदलने लगी हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार ये पता चला है कि लोगो में मोबाइल पर टीवी देखने की क्रेज तेजी से बढ़ रहा है

स्मार्टफोन  की बढ़ती ब्रिकी के बीच मोबाइल पर टीवी देखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और बीते साल इसके दर्शकों की संख्या में 400 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दूरसंचार कंपनी एयरटेल ने अपने सालाना सर्वेक्षण एयरटेल मोबीटयूड 2013 में यह निष्कर्ष निकाला है।




इसके अनुसार बीते साल लोगों ने अपने मनपसंद टीवी शो देखने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया। यही कारण है कि मनोरंजन चैनल की दर्शक संख्या खेल तथा समाचार चैनलों की तुलना में कहीं अधिक रही।

यहां जारी बयान में कंपनी ने सर्वेक्षण के हवाले से कहा है कि मोबाइल के जरिए सबसे अधिक सनी लियोनी की फोटो डाउनलोड की गईं। यह संख्या शाहरुख खान की तुलना में 300 प्रतिशत अधिक है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि सबसे लोकप्रिय हेलो ट्यून डाउनलोड में तुम ही हो (आशिकी 2) तथा सांस (जब तक है जान) छाये रहे।

इसके अनुसार मोबाइल पर टीवी देखने तथा डेटा डाउनलोड में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण स्मार्टफोन का बढ़ता इस्तेमाल है। इस दौरान स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने वालों की संख्या दोगुनी हो गई जबकि डेटा उपयोक्ताओं की संख्या 124 प्रतिशत तथा डेटा खपत २२०।

कई मायने में देखे तो मोबाइल पर टीवी देखना हमारे लिए लाभप्रद है। ये सिर्फ सुबिधाजनक ही नहीं  बल्कि सस्ता भी होता है।   सेट ऑफ़ बॉक्स और बाकी के अन्य खर्चो  जैसे बड़े झमेले से हमें स्मार्ट फोन  टीवी वाचिंग काफी दूर रखता है।

मोबाइल पर टीवी देखना  ऐसे संकेत है जिससे देश की प्रगति के बारे में पता चलता है , पर जिस प्रकार से लोग टीवी देखने के मल्टिप्लाटफोर्म का सहारा ले रहे है , उससे न केवल टीवी कम्पनियो को घटा लग रहा है , बल्कि  लम्बी समय से चली आ रही साथ बैठ के टीवी देखने की परम्परा भी कम हो रही है।  
                                                  मीडिया की स्वतंत्रता व सीमा ....



स्वतन्त्रता हर किसी की पहली जरुरत होती है, जो  इंसान को खुल के सोचने , बोलने  व कुछ करने की आजादी देती है।  स्वंत्रता के अभाव में इंसान का न केवल , शरारीरिक शोषण होता है , बल्कि मानसिक भी।  जब तक इंसान खुलकर सोचने को , अपनी भवनो को व्यक्त करने को  स्वतंत्र न हो उसकी आजादी हमेशा गुलामी जैसी होती है।

  लोकतंत्र में जो सबसे अहंम बात है है , वो है  वो है भावनाओ का व्यक्तिकरण।  फिर चाहे ये कुशासन हो , अत्याचार हो या शोषण इंसान को इन सब के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।  भले ही बुरा करने वाला इंसान कितना भी पहुच वाला हो , पैसे वाला हो हर,  पर  किसी को उसके खिलाफ स्वतंत्र रूप से बोलने की आजादी होनी चाहिए।



 स्वतंत्रा कि जो सबसे बड़ी गरिमा है , वो है इसकी सीमा।  इंसान को स्वतंत्रा दी गयी है पर इसके सदुपयोग के लिए न की  द्रुपयोग के लिये।  हम स्वतंत्र है पर वही तक , जहाँ से दूसरे कि स्वतन्त्रता शुरू होती है।  हमारी स्वतंत्राता वही ख़त्म हो जाती है , जहाँ से दूसरे कि शुरू होती है।

 वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र हर पहलु में इसकी विशेष  भूमिका है , पर आज यहाँ हम जिस विषय पर बात कर  रहे है वो है प्रेस कि स्वतन्त्रता।   जी हाँ हम सब जानते है कि प्रेस कि स्वतन्त्रता से ना केवल प्रेस को बिना किसी रोक टोक के कार्य करने कि आजादी मिलती है , बल्कि समाज विकास भी होता है।



 अगर हम प्रेस की शुरूआती दिनो कि बात भारत में करे तो , पाएंगे कि उस समय स्वतंत्रता जैसी कोई चीज ही नहीं हुआ करती थी।  अंग्रेज मीडिया को नियंत्रण में रखने के लिए तमाम प्रकार के दमन कारी क़ानून बनाकर समय - समय पर पत्रकारो को प्रताड़ित करते रहे, और उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाते रहे।

भारत की आजादी परांत जब देश का संविधान बना तब प्रेस कि स्वतंत्रता के बारे में विचार कर इसे संवैधानिक स्वतन्त्रता दी गयी।  प्रेस को जो संवैधानिक स्वतन्त्रता है , वो भारतीय संविधान के अनुच्छेद १९ (१)  (अ)  के अंतर्गत मिली नागरिको को वाणी  व अभ्व्यक्ति कि स्वतंत्रता में ही अंतर्निहित है।  कहने का तात्पर्य प्रेस को कोई अलग से ताकत नहीं दी गयी है।

ये स्वतंत्रताएं इस प्रकार से समझी जा सकती है।  देश का कोई भी नागरिक बोलकर , लिखकर , अभिनयकार व चित्रकारी के माध्यम से अपनी भावनाओ को व्यक्त कर सकता है।  किसी भी मीडियकर्मी के लिए ये स्वतंत्रताएं रामबान जैसी होती है , जिसकी ताकत से वो अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते है।

मीडिया का जो बेसिक कार्य है वो है , सूचना देना , शिक्षित करना व मनोरंजन करना।  कोई भी सूचना जिसे पाने के लिए स्वतंत्रता ना हो उसमे , सत्यता व निष्पक्षता की  कमी ही नहीं बल्कि नगण्य होता है।  एक मीडियाकर्मी को तमाम  प्रकार के बंधन , सीमाओ से मुक्त होकर काम करने की आजादी होनी चाहिए।

मीडिया द्वारा दिखाई व बताई गयी बातो का समाज पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है , ऐसे में अगर अगर मीडिआ पर बहुत ज्यादा नियंत्रण हो तो इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ सकता है।  और ऐसे में लोगो का मीडिया से विश्वास भी उठ सकता है।

कई बार ऐसे मुद्दे आते है जब मीडिया सरकार के खिलाफ आवाज उठाती है। ऐसे में अगर मीडिया को  उचित स्वतन्त्रता न हो तो , एक झूठी व पक्षपात कि पत्रकारिता  का प्रवाह सामाज में हो सकता है।  अक्सर सरकार मीडिया क़ी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने कि कोशिश करती है , ताकि उनकी काली करतूतो का सारा चिट्ठा समाज के सामने ना आ जाए।

मीडिया की स्वतंत्रता सिर्फ इसलिए नहीं कि , वो आम जनता कि आवाज है , बल्कि इसलिए भी जरुरी है, कि वो समाज का आइना  है।

 ये तो हुई स्वतंत्रता कि बात पर सवतंत्रता का मतलब कुछ भी करने कि आजादी नहीं होती इसके लिए मीडिया के ऊपर कुछ युक्ति युक्त निर्वंधन भी लागाये जाते है।  ये निर्वंधन प्रेस कि स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं , बल्कि प्रेस से एक आदर्श पत्रकारिता के लिये बनाये गए है।  संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (अ) के अंतर्गत जहाँ प्रेस कि स्वतंत्रता दी गयी है , वही १९ ( 2 ) के अंतर्गत इसपर निर्वंधन व सीमा  तय कि गयी है।

इसके अंतर्गत आठ विषय है जिसके उलंघन पर प्रेस पर उचित नियंत्रण लगाए जा सकते है।  भारत कि प्रभुता व अखण्डता , विदेशी राज्यो से मैत्री पूर्ण सम्बन्ध , सार्वजनिक व्यवस्था , राज्य की सुरक्षा, शिष्टाचार व सदाचार , न्यायालय अवमाना , मानहानि व अपराध उद्दीपन।  ये आठ ऐसे विषय है जिसके अंतर्गत मीडिया पर नियंत्रण रखा जा सकता है , पर ये नियंत्रण ना तो मनमाने तरीके से होगा  न ही आवश्यकता से अधिक।

दोनों पहलुओ को देखने के बाद ये बात समझ में आती है , कि मीडिया कि स्वतंत्रता बहुत जरुरी है , पर उतनी ही जरुरी है दूसरे की आजादी।  ऐसे में मीडिया को अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग दुसरो कि स्वतंत्रता    को ध्यान में रखकर करनी चाहिए। 

Monday, 10 February 2014

                                                     इडियट बॉक्स स्मार्ट वर्क ....



 मनोरंजन एक ऐसी चीज है जिसकी हर किसी को जरुरत होती है।  दिन भर की थकान , भागमभाग , से जब इंसान शाम को घर पहुचता है , तो उसे हलकी  मनोरंजन की जरुरत होती है।  ये मनोरंजन न सिर्फ उनके थकान को कम करती है , बल्कि तमाम परेशानियो व  मानसिक बोझ से कुछ समय के लिए अलग करती है।

     वैसे तोआज  मनोरंजन के कई साधन है , जैसे खेल ,नाटक , गीत संगीत , मोबाइल फोन्स ,    इत्यादि।  पर जो इन सबसे हट के एक साधन है उसकी तो बात ही निराली है।
 हम इसे इडियट बॉक्स ( बुद्धू बक्सा ) के नाम से जानते है।  वैसे देखने में तो ये एक डब्बा है , पर  इसमें मनोरंजन व ज्ञान का खजाना है। आज से  कई साल पहले जब टेलीविज़न का आविष्कार हुआ होगा , तो किसी ने ये महसूस नहीं किया होगा कि , एक दिन टीवी मनोरंजन का सबसे असरदार माधयम  साबित होगा।

वैसे ये बॉक्स नाम से तो बुद्धू है , पर इसके काम इतने स्मार्ट है , कि बड़े - बड़े सयाने भी इसके सामने शरमा  जाये।  ये बच्चो से लेकर बुढो तक हर किसी के दिल में अपनी पैठ बना रखा है।  सुबह से लेकर रात जब दिल करे मात्र एक एक बटन से मनोरंजन का पिटारा आप के साथ। आज टीवी के चलते हर किसी के लिए  तन्हाई ,  मायूसी व अकेलापन जैसी चीज बेईमानी हो गयी है। दुर्भाग्यवस  अगर किसी को ऐसी बिमारी लग भी  जाती है ,तो  दवा से अधिक बुद्धू बॉक्स का मनोरंजन काम करता है।

समय के साथ कदम मिलकार चलना हो या अपनी संस्कृति विरासत के बारे में जानना हो हर प्रकार की जानकारी रखता है ये बॉक्स। मनोरंजन के साथ ज्ञान का भी पिटारा है ये बुद्धू बॉक्स।  इस पर दिखाए जाने वाले तरह -  तरह के ऐतेहासिक कार्यक्रम व सांस्कृतिक क्रिया कलाप बच्चो को सीखने में रामबाण का काम करती है।  जो इतिहास टीचर बच्चो को दस दिन में नहीं समझा पाते वो काम ये बॉक्स १० मिनट में कर देता है।

ये तो हुई मनोरंजन व ज्ञान की बात , अब अगर हम समाज में जागरूकता की बात करे तो उसमे भी इसकी विशेष भूमिका है।   जहाँ एक ओऱ   दहेज़ , गैर जातीय शादी , अशिक्षा इत्यादि सम्बन्धी विषयो पर नाटक तैयार कर उसके दुष्प्रभाव को समझाने में माहिर है ये इडियट बॉक्स। वही दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण , भाईचारा , अनेकता में एकता जैसे विषयो को भी बढ़ावा देने में कारगर है ये बुद्धू बॉक्स।

बदलते समय के साथ इसके आकार में परिवर्तन हुआ है , पर क्रिया कलाप में नहीं।  कुल मिलाकर देखे तो टीवी एक जादू बॉक्स है। जिसमे से जो चाहे वो निकाले, पर हां ध्यान रहे वही निकाले जो आपके उपयोग का हो। 

Saturday, 8 February 2014

 मीडिया कल  और आज....


कहते है परिवर्तन प्रकृति का नियम होता है , और ये भी सही है कि  प्रकृति  में होने वाला हा परिवर्तन मानव जाती के अनुकूल हो।  खैर ये तो प्रकृति की बात है पर समाज में कुछ ऐसे भी परिवर्तन होते  है जो मानवजाति द्वारा होता है , अक्सर मानव समाज अपने फायदे के लिए ही ऐसे परिवर्तन  करते है।  आज  मै  यहाँ  परिवर्तन पर चर्चा  नहीं कर रहा हु बल्कि  समाज में उंचा ओहदा प्राप्त एवं समाज का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला या माने जाने वाला  मीडिया में हो रहे परिवर्तन व इसका  सामाजिक उत्तरदायित्व  से   मुह  मोड़ना तथा फायदे की भूख में नैतिकता को अनदेखा करने   सम्बंधित परिवर्तन से आप लोगो को सूचित करना   है।  मीडिया में हो रहे परिवर्तन  और इसका समाज पर पड़  रहा बुरा प्रभाव को समझने के लिए मैंने महफूज आलम रिजवी द्वारा लिखित ब्लॉग "मीडिया का चरित्र ,उम्मीद अभी बाकी"  को अपने  ब्लॉग के साथ जोड़कर आप लोगो के सामने  रख रहा हूँ , आशा करता हु इससे आप को मीडिया का बदलता चेहरा व मीडिया हित समझने में आसानी होगी। 

  परिस्थितियों का चरित्र हमेशा परिवर्तित होता रहा है। समय और सापेक्षता का सिद्धांत भी स्थायी नहीं है। विचार-व्यवहार बदलते रहे हैं। ऐसे में, सिर्फ इसलिए कि अब तक लोग मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पुकारते या मानते रहे हैं, परंपरा का निर्वाह करते हुए हम भी इसे ऐसा ही मानें, यह कतई ज़रूरी नहीं है। स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के दौर वाली पत्रकारिता और फिर इसके बाद की पत्रकारिता। ये कोई परंपरागत विमर्श-पद्धति वाला वर्गीकरण नहीं है। बल्कि ये बस काल-परिवर्तन और परिदृश्यगत् बदलाव के अनुरूप मीडिया के कायांतरण की महज सीढ़ियां हैं। पत्रकारिता समाजसेवा के जुनूनी दौर को अरसा पहले ही अलविदा कह चुकी है। अन्याय और अनीति के ख़िलाफ़ विद्रोह का शंखनाद फूंकने वाले तो हैं लेकिन अब शंख पर बाज़ार का कब्जा है।
बाज़ार ने मीडिया का कायाकल्प कर दिया है। मीडियाकर्मी अब समाज में व्याप्त बुराइयों और व्यवस्था की दगाबाज़ियों को उजागर करनेवाला हरावल नहीं रहा। वह अब बाज़ार का टूल यानी औज़ार बन गया है। बाज़ार और सत्ता प्रतिष्ठानों के बीच इसकी भूमिका टाउट यानी बिचौलियों वाली रह गई है। सन 1780 में जब बंगाल गजट जैसे समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था तो उसका मकसद भी अंग्रेजी हुकूमत और भारतीय जन मानस के बीच बढ़ती खाई को पाटना ही था। ठीक उसी तरह, जैसे कांग्रेस नाम के संगठन की नींव, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बढ़ रहे आक्रोश को शांत करने और सशस्त्र क्रांति की आशंका को खत्म कर, प्रबुद्ध वर्ग को अंग्रेजी सत्ता का सिपहसालार बनाने की ग़रज़ से ही रखी गई थी।

जेम्स ऑगस्टस हिक्की हों या ए ओ ह्यूम। दोनों का मकसद समन्वय ही था(समन्वय शब्द इसलिए क्योंकि ये लोग इतिहास पुरुष हैं और इनके लिए मध्यस्थ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता)। यहां पर बराबरी-गैर बराबरी के झमेले में उलझने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन इस बात से भी आप इनकार नहीं कर सकते कि ये दोनों ही येन-केन-प्रकारेण देश-समाज में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति घर करती घृणा और आक्रोश को कम करने की कोशिश कर रहे थे। ये अलग बात है कि अंग्रेजों ने समन्वय के जिन हथियारों का इस्तेमाल अपनी सत्ता को भारत में सुदृढ़ करने के लिए किया, वही कालांतर में उनके खिलाफ इस्तेमाल हुए और घातक भी सिद्ध हुए। अख़बार और पत्र-पत्रिकाओं का स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। कांग्रेस की कथा भी बहुत कुछ वैसी ही है।
ख़ैर, हम राजनीतिक इतिहास की पड़ताल करने नहीं बैठे हैं। हमारा मक़सद मीडिया के वर्तमान चरित्र को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और चरित्र की पड़ताल मात्र है। क्या हम इसे महज इत्तेफाक मान लें कि सन 1927 में रेडियो और आज़ादी के बाद सन 1959 में भारत में टेलीविज़न प्रसारण के शुभारंभ का मक़सद भी बहुत हद तक समाजसेवा ही था? किसानों को खेती से जुड़ी जानकारियां देना, ताकि कृषि के क्षेत्र में क्रांति आ सके। शिक्षा के प्रति लोगों को जागरुक करना। रोज़ी-रोजगार के बारे में सूचना देना। सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार और इनके खिलाफ जनमत तैयार करना आदि।

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के दौर तक भारतीय मीडिया और मीडियाकर्म से जुड़े लोग, दोनों ही अपने चरित्र और व्यवहार में जन हितैषी ही रहे। महत्वकांक्षी संजय गांधी के दबंग रुख़ और सत्ता प्रतिष्ठान की पहली टेढ़ी नज़र के बाद ही बहुत से चेहरे बेनक़ाब होने लगे। अलग बात है कि पानी अभी भी बाक़ी रहा। लोग इस पेशे को पेशा कम, सेवा ज्यादा मानते रहे या कि ये धारणा इतनी आकर्षक थी कि बिगड़ी नहीं, बनी ही रही। सत्ता से लेकर समाज तक में मीडियाकर्म और कर्मी दोनों सम्मानजनक स्थिति में ही रहे। ठीक उसी तरह जैसे डॉक्टर और टीचर। 90 का दशक तो ख़ैर फिर भी ठीक-ठाक ही रहा। हालांकि गुपचुप पेड न्यूज़ जैसी प्रवृति घुसपैठ कर चुकी थी। बेशर्मी टाइम्स ग्रुप से शुरू हुई और 20वीं सदी के अंतिम दशक ने सबकुछ उलट-पुलट कर दिया।
                 

उदारीकरण की आंधी ने मीडिया के समाजसेवी होने का दंभ तोड़ा तो मीडियाकर्मियों के सम्मान का कीर्ति-स्तम्भ भी डवांडोल हुआ। समाचार पत्रों के मालिकों ने अब कथित संभ्रांत और समाजसेवी, साहित्यशिल्पियों के हाथ से कमान छीननी शुरू कर दी। उन्हें अब सारगर्भित लेखों और विचारोत्तेजक संभाषणों के सिद्धहस्तों की ज़रूरत नहीं रही। वहां वैसे लोगों की पूछ बढ़ी जो सत्ता के गलियारे में अपनी पैठ रखते हों, जो कॉर्पोरेट हित में मीडिया एथिक्स को ठेंगा दिखा सकते हों। थोड़ी बेहयाई बरतें तो ये कि कॉर्पोरेट दलाली में माहिर हों। उदारीकरण की कोख से जन्मी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो इस मामले में प्रिंट को बुरी तरह से चित कर दिया।
दूरदर्शन के सरकारी भोंपू बनने का भी यही दौर था। निजी न्यूज़ चैनलों की होड़ का भी यही ज़माना था। लोगों ने दूरदर्शन को सरकार का तोता गरदानते हुए, आजतक, स्टार न्यूज़, ज़ी न्यूज़ और नई दिल्ली टेलीविज़न(जिसे लोग एनडीटीवी के नाम से जानते हैं) को सिर-आंखों पर बिठाना शुरू कर दिया। बीबीसी बोले तो पक्की ख़बर से छिटक कर लोग सबसे तेज़ बोले तो आज तक, सबसे सटीक बोले तो एनडीटीवी जैसे मुहावरों की गिरफ्त में आ गए। शुरूआती दौर जैसा कि हमने शुरू में ही कहा है, बड़ा ही आकर्षक और हृदयग्राही हुआ करता है। यहां भी रहा। निर्भीक रिपोर्टिंग, बेबाक टिप्पणी, लाजवाब प्रजेंटेशन और जनहित से जुड़े मुद्दे उठाने वाले तमाम महारथी यहां भी थे(बिल्कुल प्रिंट मीडिया की ही तरह)। लेकिन अचानक टीआरपी डायन बीच में आ गई। पत्रकारिता का बुखार उतरने लगा। बाज़ार का नशा चढ़ने लगा।
दिखना था, लिहाजा खादी की झोली और पजामा-कुर्ता से काम नहीं चल सकता था। अच्छे कपड़े के लिए अच्छी आमदनी चाहिए थी। अच्छी आमदनी के लिए बाज़ार के नज़र-ए-करम की दरकार थी। सबसे बढ़कर मालिक की फटकार और नौकरी जाने का ख़ौफ़, रेवेन्यू जेनरेट करो या फिर बाहर जाओ।
सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी घटी। निजीकरण ने नये सपने बांटे। जो यहां अनफिट सिद्ध हुए(या यूं कह लें कि मौका नहीं पा सके), वो इधर चले आए। नये रंगरूटों ने मीडिया एथिक्स पढ़ा तो था, लेकिन लोगों को समझाने के लिए, दूसरों को गरियाने के लिए। अपने लिए तो जो हम कह रहे हैं, वही सही है। यहां तो ऐसे ही चलेगा। चलने भी लगा। पत्रकार जो पहले सच के सामने किसी की कुछ भी नहीं सुनता था, वो अब या तो बेरोजगार होने लगा या फिर मालिक के निर्देश पर सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े प्रभावशाली लोगों को संस्थान के लिए, संस्थान के मालिक के हित के लिए सेट करने लगा।

बाज़ार ने टार्गेट व्यूअर यानी दर्शक तय कर दिया। ख़बरें वही हैं, जो उपभोक्ता के हित में है, बाज़ार के हित में है। सरकार ने विज्ञापन की रेवड़ थमा दी और साथ में अघोषित संदेश भी कि ख़बरें वही जो सरकार के हित में है। मीडिया अब उद्योग बन गया। पत्रकार अब पेशेवर होने लगे। संस्थान अब मुनाफा ढूंढने लगा। नेता अब स्पेस डिमांड करने लगे। बाज़ार चमक-दमक और आकर्षण मांगने लगा। स्वतंत्रता की आग, अन्याय का विरोध, जन सरोकार, आम आदमी की आवाज़.., सब बीते हुए साल के कैलेंडर के दिन-तारीख़ बनते चले गए। मीडिया में जो बाक़ी बचा, वो खांटी व्यापार था।
स्लोगन भी देखिए, जो दिखता है वो बिकता है। यानी बार बालाओं का डांस, दुष्कर्म नहीं, बलात्कार और रेप की ख़बरें। हिरोइनों के नखरे। बिकनी और बिरयानी की बात। ब्रांड और कम्पनियों की बात। भूत, धरती पर ख़तरा, नर्क का देवता, स्वर्ग की शाम या फिर कहीं किसी कारण से सियासी बवाल और नेता का बयान। हां, कभी-कभार अगर सरकार विज्ञापन में आनाकानी बरते तो फिर जनहित और सरकार की विफलता भी ख़बरों में शुमार होने लगे।
साहित्य की तो ख़ैर बात ही छोड़ दीजिए, ख़बरों की परिभाषा भी बदल दी गई। खेल बोले तो क्रिकेट हो गया। जनहित बोले तो सत्ताधारी दल का भोंपू। मनोरंजन बोले तो फिल्मों का प्रोमोशन। हिरोइनों के निजी संबंध। हिरोइनों के कपड़ों की नाप-जोख, नख-शिख वर्णन(टीवी का रीति काव्य)। सोप, सीरियल, धारावाहिक, द्विअर्थी संवादों से लोगों को विभत्स रस में भिंगोने वाले मसख़रे और उनकी आं-उं.., सबकुछ न्यूज़ बन गए। न्यूज़ की चौहद्दी से दूर जो रह गया वो ख़बरें थीं। वो जनहित से जुड़े सवाल थे।
कभी बोरवेल टीआरपी वाला साबित हुआ तो कभी किसी बेबस आदिवासी युवती का चीरहरण कांड। कभी पुलिस की लाठियां, तो कभी फायरिंग। कभी आशिक की पिटाई तो कभी पत्नी की हिम्मत। कभी अश्लील डांस और इसकी थू-थू की आड़ में पूरा का पूरा कोकशास्त्र ही प्रस्तुत कर दिया गया। जबकि इसी बीच कहीं कोई महिला न्याय के लिए अनशन पर बैठी और वहां से सीधे श्मशान जा पहुंची। मीडिया तक ख़बर ही नहीं पहुंची। मीडिया बहुत ज्यादा पिपुल्स फ्रेंडली हुआ तो टॉक शोज आ गए। चार चों-चों नेताओं को स्टूडियो में बिठा लिया। टॉपिक क्या, बस कुछ भी, कैसा भी। फिर आप ग़लत, मैं सही। मैं सही, आप ग़लत। इसी बीच नेताओं की थुक्कम-फजीहत, तू-तू, मैं-मैं, इनका इतिहास, उनका परिहास।
दिखने वाला बिकने लगा। माफ कीजिएगा, बिकने लगी। मीडिया में आजकल इसका भी बहुत क्रेज़ है। औरतों के मानसिक और सामाजिक आज़ादी की बात, थोड़ी पीछे रह गई। दिखने और दिखाने पर ज़ोर दिया जाने लगा। औरत प्रोडक्ट हो गई। औरत बाज़ार हो गई। औरत टीआरपी की सरदार हो गई। सरकार को भी मीडिया से आपत्ति तब होती है, जब वो किसानों के साथ विश्वासघात को उजागर कर देती है। मीडिया तब ख़तरनाक हो उठता है, जब वो भ्रष्टाचार या फिर ऐसे ही दूसरे दीमकों की तरफ कैमरा फोकस कर जूम करने लगता है। फिर मीडिया पर कंट्रोल के लिए नयी पॉलिसी और क़ानून की ज़रूरत महसूस होने लगती है। पूरी की पूरी श्रृंखला है। जो काम हिक्की और ह्यूम ने शुरू किया था, वो धीरे-धीरे प्रवृति बन गई। आज का मीडिया और एनजीओ वही सब कर रहे हैं। घोषित कर्तव्य वही पुराना है, अघोषित एजेंडे पर काम हो रहा है। ख़ैर, अगर इन बातों में उलझे तो पूरा उपन्यास तैयार हो जाएगा। हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली स्थिति है।
हिन्दुस्तान में मीडिया अपने शुरूआती दौर से लेकर अब तक कई युग, कई रंग और कई रूप ग्रहण कर, छोड़ चुका है। गति को अभी विराम नहीं लगा है। इतिहास के आलोक में उम्मीद बस इतनी सी कि मीडिया फिर से बदलेगा। अभी भले ही इस बुद्धु बक्से और कागज़ के पन्नों पर मुट्ठी भर लोगों का अवैध कब्जा हो। लेकिन बदलाव की उम्मीद बेमानी नहीं है। सरकार, कॉर्पोरेट और मीडिया मुग़लों के हित। इन तमाम चीज़ों को झेलता पत्रकार या मीडियाकर्मियों का बड़ा तबका, कल भी बेचैन था, आज भी है। बस इंतज़ार इतना सा कि शंख इनके हाथ लगे। शंखनाद में समय नहीं लगता।

 श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम,१९५५ और पत्रकार-ब्रज की दुनिया






मैंने हरी सबकी पीड़ा;
लेकिन रहा स्वयं उपेक्षित,
भूखा,नंगा,प्यासा कीड़ा.
ये पंक्तियाँ स्वयं मेरी हैं और मैंने इसे पत्रकारों की स्थिति को बयाँ करने के लिए लिखा है.कितने आश्चर्य की बात है,कितनी बड़ी बिडम्बना है कि समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए रहनुमा का काम करनेवाले पत्रकार खुद इतने उपेक्षित हैं कि उनकी ज़िन्दगी कीड़े-मकोड़े से भी गई-बीती है.ऐसा भी नहीं है कि सारे पत्रकारों की आर्थिक स्थिति ख़राब ही हो.ऊपर वाले पत्रकार मजे में हैं लेकिन उनकी ईज्जत मालिकों के सामने चपरासी जितनी ही है और अपने पदों पर बने रहने के लिए उन्हें लगातार मालिकों और प्रबंधन की चाटुकारिता करनी पड़ती है.ऐसा भी नहीं है कि पत्रकारों को शोषण से बचाने के लिए सरकार ने किसी तरह की व्यवस्था नहीं की है.१९५५ में संसद ने पत्रकारों की चिरकालीन मांग को मूर्त रूप देते हुए श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र  कर्मचारी और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम,१९५५ पारित किया.इसका उद्देश्य समाचारपत्रों और संवाद समितियों में काम करनेवाले श्रमजीवी पत्रकारों तथा अन्य व्यक्तियों के लिए कतिपय सेवा-शर्तें निर्धारित व विनियमित करना था.इससे पहले अखबारी कर्मचारियों को श्रेणीबद्ध करने,कार्य के अधिकतम निर्धारित घंटों, छुट्टी,मजदूरी की दरों के निर्धारण और पुनरीक्षण करने,भविष्य-निधि और ग्रेच्युटी आदि के बारे में कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी.पत्रकारों को कानूनी तौर पर कोई आर्थिक व सेवारत सुरक्षा प्राप्त नहीं थी.इस कानून में समाज में पत्रकार के विशिष्ट कार्य और स्थान तथा उसकी गरिमा को मान्यता देते हुए संपादक और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों के हित में कुछ विशेष प्रावधान किए गए हैं.इनके आधार पर उन्हें सामान्य श्रमिकों से,जो औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम,१९४७ से विनियमित होते हैं,कुछ अधिक लाभ मिलते हैं.पहले यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं था पर १९७० में इसका विस्तार वहां भी कर दिया गया.अतः अब यह सारे देश के पत्रकारों व अन्य समाचारपत्र-कर्मियों के सिलसिले में लागू है.श्रमजीवी पत्रकार की कानूनी परिभाषा पहली बार इस अधिनियम से ही की गई.इसके अनुसार श्रमजीवी पत्रकार वह है जिसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता हो और वह किसी समाचारपत्र स्थापन में या उसके सम्बन्ध में पत्रकार की हैसियत से नौकरी करता हो.इसके अन्तर्गत संपादक,अग्रलेख-लेखक,समाचार-संपादक,उप-संपादक,फीचर लेखक,प्रकाशन-विवेचक (कॉपी टेस्टर),रिपोर्टर,संवाददाता (कौरेसपोंडेंट),व्यंग्य-चित्रकार (कार्टूनिस्ट),संचार फोटोग्राफर और प्रूफरीडर आते हैं.अदालतों के निर्णयों के अनुसार पत्रों में काल करनेवाले उर्दू-फारसी के कातिब,रेखा-चित्रकार और सन्दर्भ-सहायक भी श्रमजीवी पत्रकार हैं.कई पत्रों के लिए तथा अंशकालिक कार्य करनेवाला पत्रकार भी श्रमजीवी पत्रकार है यदि उसकी आजीविका का मुख्य साधन अर्थात उसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता है.किन्तु,ऐसा कोई व्यक्ति जो मुख्य रूप से प्रबंध या प्रशासन का कार्य करता है या पर्यवेक्षकीय हैसियत से नियोजित होते हुए या तो अपने पद से जुड़े कार्यों की प्रकृति के कारण या अपने में निहित शक्तियों के कारण ऐसे कृत्यों का पालन करता है जो मुख्यतः प्रशासकीय प्रकृति के हैं,तो वह श्रमजीवी पत्रकार की परिभाषा में नहीं आता है.इस तरह एक संपादक श्रमजीवी पत्रकार है यदि वह मुख्यतः सम्पादकीय कार्य करता है और संपादक के रूप में नियोजित है.पर यदि वह सम्पादकीय कार्य कम और मुख्य रूप से प्रबंधकीय या प्रशासकीय कार्य करता है तो वह श्रमजीवी पत्रकार नहीं रह जाता है.लेकिन तृणमूल स्तर के अधिकतर पत्रकारों को नियोजक पत्रकार मानते ही नहीं वे नियुक्ति के समय ही कर्मी से लिखवा लेते हैं कि पत्रकारिता उनका मुख्य व्यवसाय नहीं है और उनका मुख्य व्यवसाय कोई दूसरा है.जब मैं पटना,हिंदुस्तान में काम करने गया था तब मुझे भी एक कागज हस्ताक्षर के लिए दिया गया जिस पर लिखा गया था कि पत्रकारिता मेरा मुख्य कार्य नहीं है.साथ ही उसमें यह भी भरना था कि मेरा मुख्य व्यवसाय क्या है.मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस कॉलम में क्या भरूँ.मैंने इस बारे में समाचार समन्वयक देवेन्द्र मिश्र जी से सलाह मांगी क्योंकि मेरा मुख्य पेशा पत्रकारिता ही था.उनके कहने पर मैंने इस कॉलम में टीचिंग भर दिया.हालांकि मैं जानता था कि मेरे साथ अन्याय किया जा रहा है लेकिन मैं मजबूर था जैसे सारे पत्रकार मजबूर होते हैं.मैं अपने कैरिअर की शुरुआत कर रहा था और इस स्थिति में नहीं था कि विरोध कर सकूं.श्रमजीवी पत्रकार होते हुए भी मैं जबरन इसकी परिभाषा से बाहर कर दिया गया और खून के घूँट पीकर रह गया.यहाँ मैं यह भी बताता चलूँ कि अधिनियम की धारा ३ (१) से श्रमजीवी पत्रकारों के सम्बन्ध में वे सब उपबंध लागू किये गए हैं जो औद्योगिक विकास अधिनियम,१९४७ में कर्मकारों (वर्कमैन)पर लागू होते हैं.किन्तु,धारा ३ (२) के जरिये पत्रकारों की छंटनी के विषय में यह सुधार कर दिया गया है कि छंटनी के लिए संपादक को छह मास की और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों को तीन मास की सूचना देनी होगी.संपादकों और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों को इस सुधार के साथ-साथ वह सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त है जो औद्योगिक विकास कानून के अन्तर्गत अन्य कर्मकारों को सुलभ है.इतना ही नहीं पत्रकारों को ग्रेच्युटी की अदायगी के बारे में भी श्रमजीवी पत्रकार कानून में विशेष उपबंध किये गए हैं.धारा 5 में यह प्रावधान है कि किसी समाचारपत्र में लगातार तीन वर्ष तक कार्य करनेवाले श्रमजीवी पत्रकारों को,अनुशासन की कार्रवाई के तौर पर दिए गए दंड को छोड़कर,किसी कारण से की गई छंटनी पर या सेवानिवृत्ति की आयु  हो जाने पर उसके सेवानिवृत्त होने पर,या सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो जाने पर,या दस वर्ष तक नौकरी के बाद किसी कारणवश स्वेच्छा से इस्तीफा देने पर,उसे मालिक द्वारा सेवाकाल के हर पूरे किए वर्ष या उसके छह मास से अधिक के किसी भाग पर,१५ दिन के औसत वेतन के बराबर धनराशि दी जाएगी.स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले श्रमजीवी पत्रकार को अधिकाधिक साढ़े १२ मास के औसत वेतन के बराबर ग्रेच्युटी मिलेगी.यदि कोई श्रमजीवी पत्रकार कम-से-कम तीन वर्ष की सेवा के बाद अंतःकरण की आवाज के आधार पर इस्तीफा देता है तो उसे भी इसी हिसाब से ग्रेच्युटी दी जाएगी.जहाँ तक काम और विश्राम का सवाल है तो इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाए गए नियमों के अध्याधीन रहते हुए लगातार चार सप्ताहों की किसी अवधि के दौरान,भोजन के समयों को छोड़कर, १४४ घंटों से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता है,न ही उसे इससे अधिक समय तक काम करने की अनुमति दी जा सकती है.हर श्रमजीवी पत्रकार को लगातार सात दिन की अवधि के दौरान कम-से-कम लगातार २४ घंटों का विश्राम दिया जाना चाहिए.सप्ताह को शनिवार की मध्य रात्रि से आरम्भ समझा जाता है (धारा ६).श्रमजीवी पत्रकारों के लिए २ प्रकारों की छुट्टियों-उपार्जित छुट्टी और चिकित्सा छुट्टी-का स्पष्ट प्रावधान किया गया है.शेष छुट्टियों के सम्बन्ध में नियम बनाने का उपबंध है.उपार्जित छुट्टी काम पर व्यतीत अवधि की १/११ से कम नहीं होगी और यह पूरी तनख्वाह पर मिलेगी.चिकित्सा प्रमाण-पत्र पर चिकित्सा छुट्टियाँ कार्य पर व्यतीत अवधि की १/१८ से कम नहीं होंगी.यह आधी तनख्वाह पर दी जाएगी.इसका अर्थ मोटे तौर पर यह है कि श्रमजीवी पत्रकार को वर्ष में एक मास की उपार्जित छुट्टी और चिकित्सा प्रमाणपत्र के आधार पर आधी तनख्वाह पर चार सप्ताह की छुट्टी दी जानी चाहिए (धारा ७).काम के घंटों का प्रावधान संपादकों पर लागू नहीं होता.संवाददाताओं,रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों को किसी दिन काम शुरू करने के बाद उस समय तक समझा जाएगा जब तक वह उसे पूरा नहीं कर लेते.किन्तु,यदि उनसे पूरे सप्ताह में एक या अधिक बार हीं घन्टे या उससे अधिक का विश्राम देकर इसकी क्षति-पूर्ति करनी होगी.अन्य श्रमजीवी पत्रकारों के लिए सामान्य कार्य-दिवस में दिन की पारी में छह घन्टे और रात की पारी में साढ़े पॉँच घन्टे से ज्यादा समय का नहीं होगा.रात को ११ बजे से सुबह ५ बजे के समय को रात्रि की पारी में माना जाएगा.दिन की पारी में लगातार चार घन्टे के काम के बाद एक घन्टे का और रात्रि की पारी में लगातार तीन घन्टे के कार्य के उपरांत आधे घन्टे विश्राम दिया जाना चाहिए.श्रमजीवी पत्रकार को लगातार दूसरे सप्ताह में रात्रि पारी में काम करने को नहीं कहा जा सकता है.उसे १४ दिनों में एक सप्ताह से ज्यादा रात्रि की पारी में नहीं लगाया जा सकता है.साथ ही एक रात्रि पारी से दूसरी रात्रि पारी में बदले जाने के बीच चौबीस घन्टे का अन्तराल होना चाहिए.दिन की एक पारी से दूसरी पारी में बदले जाने के समय यह अन्तराल १२ घन्टे का होना चाहिए.श्रमजीवी पत्रकार वर्ष में १० सामान्य छुट्टियों का अधिकारी है.यदि वह छुट्टी के दिन काम करता है तो उसे इसकी पूर्ति किसी ऐसे दिन छुट्टी देकर करनी होगी जिस पर नियोजक और पत्रकार दोनों सहमत हों.छुट्टियों और साप्ताहिक अवकाश की मजदूरी श्रमजीवी पत्रकारों को दी जाएगी.काम पर गुजरे ११ मास पर एक मास उपार्जित छुट्टी दी जाएगी.किन्तु,९० उपार्जित छुट्टियाँ एकत्र हो जाने के बाद और छुट्टियाँ उपार्जित नहीं मानी जाएगी.सामान्य छुट्टियों,आकस्मिक छुट्टियों और टीका छुट्टी की अवधि को काम पर व्यतीत अवधि माना जाएगा.प्रत्येक १८ मास की अवधि में एक मास की छुट्टी चिकित्सक के प्रमाण-पत्र पर दी जाएगी.यह छुट्टी आधे वेतन पर होगी.ऐसी महिला श्रमजीवी पत्रकारों को,जिनको सेवा एक वर्ष से अधिक का हो,तीन मास तक की प्रसूति छुट्टी दी जाएगी.यह छुट्टी गर्भपात होने पर भी सुलभ की जाएगी.इसके अलावा नियोजक की ईच्छा पर वर्ष में १५ दिन की आकस्मिक छुट्टी दी जाएगी.नियम ३८ में यह व्यवस्था की गई है कि यदि किसी अन्य नियम,समझौते या अनुबंध का कोई भाग श्रमजीवी पत्रकारों के लिए इन नियमों से अधिक लाभकारी हो तो उन पर वह लागू होगा.ऐसा कोई नियम श्रमजीवी पत्रकारों पर लागू नहीं किया जाएगा जो इन नियमों से कम फायदेमंद हो.लेकिन असलियत एकदम अलग है.खुद मुझे हिंदुस्तान,पटना में नौकरी के आरंभिक ३ महीने तक एक भी दिन छुट्टी नहीं दी गई और कहा जाता रहा कि अभी छुट्टी के दिन का निर्धारण नहीं हो पाया है.हालांकि बाद में इसके बदले मुझे अलग से छुट्टी दे दी गई.इतना ही नहीं मुझे एक दिन की भी उपार्जित या चिकित्सकीय छुट्टी नहीं दी गई.हमें चाहे हमारी ड्यूटी रात की शिफ्ट में हो या दिन की शिफ्ट में हो प्रतिदिन कम-से-कम ८ घन्टे काम करना पड़ता था.कई जगहों पर पत्रकारों से लगातार महीनों तक रात की शिफ्ट में काम कराया जाता है चाहे इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर ही क्यों न पड़े.इस अधिनियम का एक महत्वपूर्ण उपबंध श्रमजीवी पत्रकारों के लिए मजदूरी की दरें नीयत करने की शक्ति केंद्रीय सरकार में निहित करने के विषय में है.धारा ८ (१) में उपबंधित किया गया है कि केंद्रीय सरकार एक निर्धारित रीति से श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य समाचारपत्र-कर्मचारियों के लिए मजदूरी की दरें नियत कर सकेगी और धारा ८ (२) में कहा गया है कि मजदूरी कि दरों को वह ऐसे अंतरालों पर,जैसा वह ठीक समझे,समय-समय पर पुनरीक्षित कर सकेगी.दरों का निर्धारण और पुनरीक्षण कालानुपाती (टाइम वर्क) और मात्रानुपाती (पीस वर्क) दोनों प्रकार के कामों के लिए किया जा सकेगा.पर,यह व्यवस्था भी की गई है कि सरकार वेतन दरों का निर्धारण मनमाने तौर पर न करे.इसलिए धारा ९ में एक मजदूरी बोर्ड के गठन का प्रावधान किया गया है.बोर्ड की सिफफिशों पर विचार करके ही मजदूरी की दरें नियत की जा सकती है.बोर्ड में अध्यक्ष समेत ७ सदस्य नियुक्त किये जाते हैं.किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का विद्यमान या भूतपूर्व न्यायधीश ही इसका अध्यक्ष हो सकता है.अन्य सदस्यों में समाचारपत्रों के नियोजकों और श्रमजीवी पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करनेवाले २-२ व्यक्ति और २ स्वतंत्र व्यक्ति होते हैं.मजदूरी बोर्ड समाचारपत्रों-स्थापनों,श्रमजीवी पत्रकारों,गैर-पत्रकार समाचारपत्र-कर्मचारियों तथा इस विषय में हितबद्ध अन्य व्यक्तियों से अभ्यावेदन आमंत्रित करता है.बोर्ड अभ्यावेदनों पर विचार करके तथा अपने समक्ष रखी गई सारी सामग्री की परीक्षा करके अपनी सिफारिशें केंद्रीय सरकार से करता है.इसके बाद केंद्रीय सरकार का काम है कि वह सिफारिशें प्राप्त होने के उपरांत,जहाँ तक हो सके,शीघ्र मजदूरी की दरें नीयत या पुनरीक्षित करने सम्बन्धी आदेश जारी करे.यह आदेश बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार या उसमें ऐसे किसी फेरबदल के साथ,जिसे वह उचित समझे,जारी किया जा सकता है.किन्तु,फेरबदल ऐसा नहीं होना चाहिए जो बोर्ड की सिफारिशों के स्वरुप में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर दे.सिफारिशों को लागू करनवाला केन्द्रीय सरकार का प्रत्येक आदेश राजपत्र में प्रकाशित होने की तारीख़ या आदेश में विनिर्दिष्ट किसी अन्य तारीख से अमल में आता है.केंद्रीय सरकार के आदेश के प्रभाव में आ जाने पर,प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार और गैर-पत्रकार समाचारपत्र-कर्मचारी इस बात का हकदार हो जाता है कि उसे उसके नियोजन द्वारा उस दर पर मजदूरी दी जाए जो आदेश विनिर्दिष्ट मजदूरी की  दर से किसी दशा में कम न हो (धारा १३).इस अधिनियम का उल्लंघन करनेवाले नियोजक को अधिकतम ५०० रूपये के जुर्माने का प्रावधान है जो एकदम मामूली है.लेकिन वास्तव में होता क्या है पहले ही प्रत्येक कर्मी से नियुक्ति के समय एग्रीमेंट भरवाया जाता है जिससे वह नियोजक रहमो-करम पर काम करने के लिए बाध्य हो जाता है जिस तरह खुद मेरे साथ किया गया.उसे कभी भी बिना नोटिस के निकाल-बाहर कर दिया जाता है.अगरचे तो वह कोर्ट का रूख करता ही नहीं और अगर करता भी है तो कानून के दांव-पेंच में उलझकर रह जाता है.इस प्रकार हमने देखा कि दुनियाभर दुखी-दीनों का ख्याल रखनेवाले पत्रकारों की खुद  की दशा ही दयनीय है और उनकी कोई सुध लेनेवाला नहीं है.ग्रामीण क्षेत्रों के रिपोर्टरों को तो पंक्ति के आधार पर पैसे दिए जाते हैं.उनकी रक्षा के लिए कानून बना दिए गए हैं लेकिन उनका पालन नहीं किया जाता.हालांकि इनके कई संगठन भी हैं लेकिन उनके नेता भी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं.जाने कब स्थितियां बदलेंगी और पत्रकार भी सम्मान के साथ ज़िन्दगी जी सकेंगे,जाने कब??

Friday, 7 February 2014

                                             रियलिटी शोज की रियलिटी .......





बदलते जवाने के साथ टीवी के सेरिअल्स भी बदल रहे है, जहाँ कभी टीवी पर  सिर्फ  पारिवारिक ड्रामा ही पसंद किया जाता था आज वहा रियलिटी शो  का  बोल बाला है।  बढ़ते रियलिटी शो और दर्शको की इसके प्रति बढ़ाते  रुझान को  देख लगता है , कि  आज अधिक से अधिक लोग टीवी रियलिटी शो के लिए ही देख रहे है।

टीवी और रियलिटी शो आजकल एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। ऐसा कोई भी टीवी चैनल नहीं है जिसमें कोई न कोई रियलिटी शो न आ रहा हो। मुद्दा यह है कि रियलिटी शोज़ के नाम पर सच दिखाने वाले इन कार्यक्रमों में असल में कितना सच और कितना झूठ (बुना हुआ) शामिल रहता है यह किसी को भी पता नहीं।  अक्सर ऐसा होता है जब रियलिटी शोज में कोई कंटेस्टेंट बाहर होता है , तो उसके साथ मानो सबके आँखों  आंसू बहने लगते है।  कभी - कभी को तो चीजो को  ऐसे पोर्ट्रेट किया जाता है  , कि देखने वाले ये भूल जाते है , कि ये टीवी है।  अपने शो कि टी आर पी बढ़ने केलिये चैनल वाले ऐसे भावनात्मक चीजो को दिखा कर ऑडियंस को अपनी और बांधे रहते है।



अधिकांश दर्शक इनके भावनात्मक ड्रामे और सनसनीखेज रोमांच की पकड़ में आ ही जाते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या वाकई दर्शक इतने बुद्धिहीन हैं कि वे रियलिटी शो के सच और झूठ को समझ नहीं पाते?   इस बात को जानने के लिए मैं  अपने क्षेत्र के कुछ ऐसे युवाओ से मिला जो निरंतर रियलिटी शोज देखते है।  तो आइये जानते है क्या सोचते है आज के युवा ऐसे रियलिटी शोज पर  ?
ग्रेजुएशन की छात्रा अमीना से जब मैंने इस बारे में पूछा तो उनका कहना था , कि रियलिटी शोज वास्तव में रियल्टी बेस्ड होता है , क्योकि वो ऐसे - ऐसे लोगो को प्लेटफार्म देते है जो कभी उसके बारे में सोचा भी नहीं होता है।


आईटी के क्षेत्र में काम करने वाली दिव्या सामड़ कहती हैं- 'आज जितने भी रियलिटी शो दिखाए जा रहे हैं उनके पीछे शुद्ध व्यावसायिकता छुपी हुई है। हर चैनल वाले अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए रियलिटी शोज में ऐसे  भावनात्मक ड्रामे करवाते रहते है।  बात सिर्फ भावनात्मक ड्रामे की ही नहीं बल्कि कई बार तो वो रियलिटी  शोज के  नाम पर समाज के सामने हिंसा , अपराध जैसी चीजो को परोसते है।  उदाहरणार्थ बिग बॉस को ही ले लीजिये।

 बी एम्  एम् कि छात्रा मनीषा राय  कहती है ,  अधिकांश लोग रियलिटी शो इसलिए देखते हैं कि इनमें उन्हें सामान्य, एकरसता वाले सीरियल्स से हटकर कुछ देखने को मिल जाता है। ऐसा नहीं है कि रियालिटी शो अच्छे या सच्चे नहीं हो सकते लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इनमें से व्यावसायिकता को हटाना पड़ेगा, जो संभव नहीं है। हालाँकि मेरा यह भी मानना है कि कुछ रियलिटी शो प्रतिभाओं को मंच भी उपलब्ध करवाते हैं लेकिन फिर वही व्यावसायिकता आड़े आ जाती है और असल उद्देश्य कहीं खो जाता है।'



'देखा जाए तो साठ प्रतिशत से भी ज्यादा झूठ ही रियलिटी शो की बुनियाद होता है। कई बार तो आम दर्शक इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते कि जो वो देख रहे हैं असल में वैसा कुछ है ही नहीं। फिर इसे भी रोमांच तथा सनसनी का तड़का लगाकर दिखाया जाता है। कुछ मिलाकर मामला पैसे कमाने का ही होता है।' -कहते है ग्राफ़िक्स डिज़ाइनर धीरज पाण्डेय।

पूजा मानती हैं कि वर्तमान में दिखाए जा रहे कई रियलिटी शोज का नकारात्मक असर समाज पर पड़ रहा है। खासतौर पर बच्चे इससे बहुत बुरी तरह प्रभावित हैं। गाने और डांस के कई रियलिटी शो ऐसे हैं जो बच्चों के नाम पर भावनाओं, रोमांच और दिखावे का ताना-बाना बुनते हैं और बच्चों को इस्तेमाल करते हैं।

 युवाओ की पतिक्रिया से जो एक बात साफ़ है वो है लाभार्जन का।  आज टीवी सिर्फ लाभ कमाने का एकमजबूत माध्यम है , और ये लाभ कमाने के रियलिटी शोज के प्रोदूसर्स एंड डिरेक्टर्स  ऑडियंस के भावनाओ संघ खेलते है।  साथ ही रियलिटी शोज के नाम पर  कभी झूठ कभी फरेब तो कभी  अपराध जैसी चीजो  को दर्शको के सामने  रखते  है।

Wednesday, 5 February 2014

                                               दूरदर्शन की यात्रा .......





टेलीविज़न एक ऐसा माध्यम है जो हमारी तीन मुलभुत चीजो की पूर्ति करता है। सूचना देना , शिक्षित करना व स्वस्थ्य मनोरंजन करना।  टेलीविज़न के माधयम से हम देश विदेश में होने वाले परिवर्तन से परिचित होते है। टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले प्रोग्राम से जहाँ हमें विभिन्न प्रकार के संस्कृति , परम्परा के बारे में पता चलता है , वही दूसरी ओर ऐसे प्रोग्राम हमें शिक्षित भी करते है।  ऐसे विभिन्न प्रकार के कार्यकर्मो से हमारा  स्वास्थ्य मनोरंजन भी होता है।

  टेलीविज़न आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अहम् हिस्सा बन गया है। हम अपने दिन की शुरुआत सुबह - सुबह टेलीविज़न पर आने वाले भक्ति गीतो से करते है। दोपहर के समय घर के काम धंधो को निपटाने के बाद घरेलु औरते अपना पसंदीदा सीरियल्स देखती  है।  शाम को  देश दुनिया में घट रही घटनाओ के बारे में जानकारी के लिए हम समाचार देखते है , वहीँ रात को थोड़े बहुत मनोरंजक कार्यक्रमो के साथ दिन का समापन होता है।



 भारत में टेलीविज़न की शुरुआत २० वीं शताब्दी के मध्य में हुआ।  भारत में टेलीविज़न की औपचारिक शुरुआत १५ सितम्बर १९५९ को हुआ , पर १९५६ में दिल्ली में यूनेस्कोके साथ हुयी एक बैठक में यूनेस्को  द्वारा २०००० डॉलर की आर्थिक मदद से दूरदर्शन की शुरुआत भारत में हुयी।  इस तरह अगर हम देखे तो भारत में दूरदर्शन की शुरुआत का श्रेय यूनेस्को को जाता है।  यूनेस्को ने दिल्ली बैठक के दौरान टेलीविज़न की शिक्षा , ग्रामीण विकास तथा सामुदायिक विकास में विशेष भूमिका बतायी।  और भारत  को एक चैनल खोलने की सलाह दी।

 इस बैठक के तीन वर्ष बाद भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने १५ सितम्बर १९५९ को दिल्ली में दूरदर्शन की सेवा का विधिवत उद्घटान किया। भारतीयो के लिए १९६० का दसक किसी चमत्कार से कम न था।  अब तक जिनके मनोरजन का माध्यम सिर्फ फिल्मे हुआ  करती थी , अब उन्हें   दूरदर्शन भी विकल्प में मिल गया था।   प्रारंभिक दौर में दूरदर्शन पर सिर्फ एक घंटे का कार्यक्रम प्रसारित  होता था , और ये सप्ताह में सिर्फ दो बारआते थे।

 दूरदर्शन ने अपनी शुरुआती कड़ी में ही जो बड़ी सफलता प्राप्त की वो था गणतंत्र दिवस का सीधा प्रसारण।  १९६० में दूरदर्शन ने पहली बार लाल किले से सीधा प्रसारण देश के कोने - कोने में किया था।   दूरदर्शन की यात्रा में १९८० का दसक भी बड़ा महत्वपूर्ण मना जता है।  अबतक जो दूरदर्शन पर श्वेत श्याम प्रसारण होता था अब वो रंगीन हो गयी थी।  अब धीरे - धीरे कार्यक्रमो की भी संख्या बढ़ गयी थी।  ये वो समय था जब दूरदर्शन धीरे - धीरे देश के कोने - कोने में अपना पांव पसारना शुरू कर दिया था।




७ जुलाई १९८४ का दिन दूरदर्शन के लिए बहुत ही बड़ा था।  आज के दिन दूरदर्शन ने अपना पहला धारावाहिक "हम लोग"  का प्रसारण किया था।  और जो सबसे बड़ी बात थी वो थी ये कहानी पूर्णतः स्वदेशी थी।  ये कहानी प्रसिद्ध साहित्य्कार डॉ मनोहर जोशी द्वारा लिखित थी।  इसी दसक में जो दूरदर्शन ने एक और सफलता प्राप्त की , वो था एक और चैनल का।  जी हां अब तक जो भारत में सिर्फ एक चैनल हुआ करता था वो बढ़कर दो हो गया।  १७ सितम्बर १९८४ को दूरदर्शन ने अपने दूसरे चैनल डीडी २ की शुरुआत की।   १९९९ में कारगिल युद्ध के दौरान लोगो की समाचारो में रूचि देख दूरदर्शन ने डीडी २ का नाम बदलकर २००३ में डीडी न्यूज़ कर दिया।  डीडी न्यूज़ दूरदर्शन की २४ घंटे समाचार प्रसारित करने वाली सेवा है।

 आगे चलकर दूरदर्शन ने कई और चैनल अपने साथ जोड़े  जिसमे डीडी स्पोर्ट्स , डीडी भारती , डीडी इंडिया इत्यादि मुख्य है।   वर्तमान में दूरदर्शन का मजा इंटरनेट पर भी उठाया जा सकता है , साथ ही दूरदर्शन मोबाइल पर भी उपलब्ध है।

आज दूरदर्शन सांस्कृतिक , सामाजिक , शैक्षिक , वैज्ञानिक व स्वास्थ्य सम्बन्धी ,  हर प्रकार के प्रोग्राम व चैनल अपने दर्शको के लिए उपलब्ध करा रही है।  हालांकि केबल टीवी के आने के बाद दूरदर्शन की लोकप्रियता में कुछ उतार चढ़ाव आये है , फिर भी आज  दूरदर्शन  की पहुच पूरे भारत के ८० % से ऊपर तक के  क्षेत्र तक है , वहीँ पूरी जनसंख्या के ९१ % से ऊपर तक के लोगो तक।