धार्मिक आयोजन एवं प्रदूषण
धार्मिक आयोजनों के वक़्त होने वाले प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य व वातावरण दोनों के लिए नुकसान देह है , फिर भी लोग ऐसा करने से ज़रा सा भी नहीं कतराते। आज से कई सैकड़ो वर्ष पूर्व ऐसे आयोजनों का सिर्फ एक मतलब हुआ करता था सच्ची भक्ति , पर आज इन आयोजनों का मतलब दिखावा, मस्ती एवं आस्था के नाम पर खिलवाड़ हो गया है।
हमारे देश के हर प्रदेश में ऐसे विभिन्न प्रकार के आयोजन होते है , कहीं दुर्गा पूजा तो कहीं कृष्ण उत्सव कहीं गणेश उत्सव तो कहीं शिव उत्सव। ऐसे आयोजनों के वक़्त लोग वातावरण में कई प्रकार के प्रदुषण को जन्म देते है। अगर हम बात ग्लैमर सिटी मुंबई की करे तो यहाँ का गणेश उत्सव भी काफी ग्लैमरस होता है। आंकड़ो के अनुसार हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर मुंबई में कई हजार मूर्तियाँ बनाई व बेचीं जाती है साथ ही हर साल इनमे ४ से ५ प्रतिशत नए आर्डर आते है। इन मूर्तियों को बनाने में विभिन्न प्रकार के रासयनिक कलर एवं अन्य चीजो की जरुरत पड़ती है , जो वातावरण को प्रदूषित करती है। ऐसा ही कुछ हाल होता है कोलकाता में दुर्गा पूजा के वक़्त। कोलकाता में दुर्गा पूजा के लिए बड़ी - बड़ी मूर्तियाँ एवं बड़े - बड़े पंडाल सजाये जाते है। कुछ इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी दुर्गा पूजा के समय होता है नवरात्री के मौसम में उत्तर प्रदेश में माँ दुर्गा की मूर्तियाँ लायी जाती है। इन उत्सवो के दौरान होने वाले धूम - धडाके एवं बड़े - बड़े लाउड स्पीकर्स से जहाँ एक ओर ध्वनि प्रदुषण होता है वहीँ दूसरी ओर बिजली की अधिक मात्रा में खपत भी बढाती है।
प्रदुषण का अम्बार यही नहीं थमता और इन उत्सवो के बाद जब मूर्तियों को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है तब भी प्रदुषण का ढेर हमारे सामने होता है। विसर्जन के लिए ले जाते वक़्त जहाँ एक ओर भक्तजन तेज आवाज वाले बम फोड़ते है वही दूसरी ओर अधिक मात्रा में एक दुसरे के ऊपर रंग गुलाल भी फेंकते है सात ही विसर्जन के दौरान बड़े - बड़े साउंड बॉक्स जिस भी क्षेत्र से गुजरता है मानो सबको बेहरा कर देता हो। मिटटी की इन मूर्तियों को जाल में प्रवाहित करने से जल प्रदुषण बढ़ता है जिससे जल की शुद्धता प्रभावित होती है और जलीय जिव जन्तुओ का जीवन भी खतरे में पड़ता है। विसर्जन के वक़्त मूर्तियों के श्रींगार के लिए पहनाये जाने वाले आर्टिफीसियल आभूषण एवं फूल माल लोग समुन्दर या नदी किनारे छोड़ चले जाते है जो कुछ दिन बाद सड़ना शुरू हो जाता है जिससे न केवल बदबू फैलाती है बल्कि पुरे वातावरण में असंतुलन पैदा होता है।
बात यहाँ न केवल ये सोचने की है कि कैसे इन आयोजनों से प्रदुषण की मात्र हमारे वातावरण में बढ़ती है , बल्कि ये भी सोचना है कि सच्ची भक्ति एवं इश्वर के प्रति आस्था का मूल मतलब क्या है ? क्या भगवान् के पूजा पाठ के दौरान ऐसे बड़े - बड़े लाउड स्पीकर्स एवं शोर शराबे आज के मॉडर्न युग की नयी भक्ति है ? मेरा उद्देश्य किसी के आस्था पर निशान साधना नहीं है , बल्कि ऐसे आयोजनों के वक़्त की जाने वाली अंधा धुंध प्रदुषण की बौछार से लोगो को आगाह करना है।
धार्मिक आयोजनों के वक़्त होने वाले प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य व वातावरण दोनों के लिए नुकसान देह है , फिर भी लोग ऐसा करने से ज़रा सा भी नहीं कतराते। आज से कई सैकड़ो वर्ष पूर्व ऐसे आयोजनों का सिर्फ एक मतलब हुआ करता था सच्ची भक्ति , पर आज इन आयोजनों का मतलब दिखावा, मस्ती एवं आस्था के नाम पर खिलवाड़ हो गया है।
हमारे देश के हर प्रदेश में ऐसे विभिन्न प्रकार के आयोजन होते है , कहीं दुर्गा पूजा तो कहीं कृष्ण उत्सव कहीं गणेश उत्सव तो कहीं शिव उत्सव। ऐसे आयोजनों के वक़्त लोग वातावरण में कई प्रकार के प्रदुषण को जन्म देते है। अगर हम बात ग्लैमर सिटी मुंबई की करे तो यहाँ का गणेश उत्सव भी काफी ग्लैमरस होता है। आंकड़ो के अनुसार हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर मुंबई में कई हजार मूर्तियाँ बनाई व बेचीं जाती है साथ ही हर साल इनमे ४ से ५ प्रतिशत नए आर्डर आते है। इन मूर्तियों को बनाने में विभिन्न प्रकार के रासयनिक कलर एवं अन्य चीजो की जरुरत पड़ती है , जो वातावरण को प्रदूषित करती है। ऐसा ही कुछ हाल होता है कोलकाता में दुर्गा पूजा के वक़्त। कोलकाता में दुर्गा पूजा के लिए बड़ी - बड़ी मूर्तियाँ एवं बड़े - बड़े पंडाल सजाये जाते है। कुछ इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी दुर्गा पूजा के समय होता है नवरात्री के मौसम में उत्तर प्रदेश में माँ दुर्गा की मूर्तियाँ लायी जाती है। इन उत्सवो के दौरान होने वाले धूम - धडाके एवं बड़े - बड़े लाउड स्पीकर्स से जहाँ एक ओर ध्वनि प्रदुषण होता है वहीँ दूसरी ओर बिजली की अधिक मात्रा में खपत भी बढाती है।
प्रदुषण का अम्बार यही नहीं थमता और इन उत्सवो के बाद जब मूर्तियों को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है तब भी प्रदुषण का ढेर हमारे सामने होता है। विसर्जन के लिए ले जाते वक़्त जहाँ एक ओर भक्तजन तेज आवाज वाले बम फोड़ते है वही दूसरी ओर अधिक मात्रा में एक दुसरे के ऊपर रंग गुलाल भी फेंकते है सात ही विसर्जन के दौरान बड़े - बड़े साउंड बॉक्स जिस भी क्षेत्र से गुजरता है मानो सबको बेहरा कर देता हो। मिटटी की इन मूर्तियों को जाल में प्रवाहित करने से जल प्रदुषण बढ़ता है जिससे जल की शुद्धता प्रभावित होती है और जलीय जिव जन्तुओ का जीवन भी खतरे में पड़ता है। विसर्जन के वक़्त मूर्तियों के श्रींगार के लिए पहनाये जाने वाले आर्टिफीसियल आभूषण एवं फूल माल लोग समुन्दर या नदी किनारे छोड़ चले जाते है जो कुछ दिन बाद सड़ना शुरू हो जाता है जिससे न केवल बदबू फैलाती है बल्कि पुरे वातावरण में असंतुलन पैदा होता है।
बात यहाँ न केवल ये सोचने की है कि कैसे इन आयोजनों से प्रदुषण की मात्र हमारे वातावरण में बढ़ती है , बल्कि ये भी सोचना है कि सच्ची भक्ति एवं इश्वर के प्रति आस्था का मूल मतलब क्या है ? क्या भगवान् के पूजा पाठ के दौरान ऐसे बड़े - बड़े लाउड स्पीकर्स एवं शोर शराबे आज के मॉडर्न युग की नयी भक्ति है ? मेरा उद्देश्य किसी के आस्था पर निशान साधना नहीं है , बल्कि ऐसे आयोजनों के वक़्त की जाने वाली अंधा धुंध प्रदुषण की बौछार से लोगो को आगाह करना है।

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